रविवार, 22 फ़रवरी 2026

पहली भिक्षा


पहली भिक्षा

गाँव की वह छोटी-सी सरकारी प्राथमिक पाठशाला दोपहर की धूप में शांत पड़ी थी। मिट्टी के आँगन में हवा धूल के कणों को धीरे-धीरे उड़ा रही थी। भीतर एक कमरा था, जहाँ पंद्रह-बीस बच्चे अध्यापक की अनुपस्थिति में शोर कर रहे थे।

शोर धीरे-धीरे बहस में बदला।
बहस अपशब्दों में।
और अपशब्द हाथापाई में।

गुस्से में एक लड़के ने सामने रखी लकड़ी की अध्यापक की कुर्सी उठाई और दूसरे की ओर फेंक दी। कुर्सी किसी को लगी नहीं, पर ज़ोर से ज़मीन पर गिरी और उसकी एक टांग टूट गई।

उसी क्षण दरवाज़ा खुला।

अध्यापक भीतर आए। उनकी नज़र टूटी कुर्सी पर ठहरी। चेहरा सख्त हो गया।

“किसने तोड़ी ये?”

कमरे में सन्नाटा फैल गया। कुछ बच्चों ने सिर झुका लिया। कुछ ने एक-दूसरे को देखा। कोने में बैठा एक दुबला-सा, शांत लड़का — साधो — चुपचाप अपनी उंगलियाँ मरोड़ रहा था।

खुसर-फुसर हुई।
निर्णय हुआ।
नाम लिया गया — “साधो ने।”

अध्यापक बिना कुछ पूछे उसके पास पहुँचे।
“क्यों तोड़ी?”

“मास्टर साहब… मैंने नहीं—”

थप्पड़ की आवाज़ कमरे में गूँज गई।

“झूठ बोलता है?”

साधो की आँखों में आँसू भर आए। “मैंने नहीं तोड़ी…”

पर किसी ने उसकी आँखों में झाँकने की ज़रूरत नहीं समझी।

डंडा उठा। पीठ पर पड़ा।
एक बार।
दो बार।

अंत में आदेश सुनाया गया —
“तीन सौ रुपये भरेंगे तेरे बाप। नहीं तो कल से स्कूल मत आना।”

तीन सौ रुपये।

उस घर में जहाँ पिता पूजा-पाठ करके पाँच बच्चों का पालन करते थे, वह रकम किसी दंड से कम नहीं थी।

.......

मुड़ते हुए कदम

शाम को साधो घर की ओर चला। दूर से उसने घर के बाहर लोगों की भीड़ देखी। खबर उससे पहले पहुँच चुकी थी।

उसकी पीठ अभी भी जल रही थी। मन में अपमान और भय की लहरें उठ रही थीं।

वह रुका।

बस कुछ कदम और…
और वह घर पहुँच जाता।

पर उसने पीछे मुड़कर देखा 
और फिर उल्टी दिशा में चल पड़ा।

ग्यारह साल का एक बच्चा
अपने घर, अपने नाम, अपने बचपन को पीछे छोड़कर
अज्ञात की ओर चल पड़ा।


.......

भूख और अकेलापन

दो दिन बाद वह एक अनजान शहर में था।

भूख से पेट ऐंठ रहा था। उसने ढाबे के बाहर खड़े होकर पूछा ..
“कुछ खाने को मिल जाएगा?”

किसी ने दया नहीं की।

उसने बर्तन धोने की पेशकश की। बदले में सूखी रोटी मिली।
रात को बंद दुकानों के सामने, जहाँ आवारा कुत्ते सोते थे, वहीं वह भी सिकुड़कर लेट गया।

दिन ऐसे ही बीतने लगे।
काम के बदले भोजन।
फुटपाथ पर नींद।
और भीतर गहरी चुप्पी।

....

एक साधु की दृष्टि

एक दिन एक साधु ने उसे देखा।
“घर से भागे हो?”

साधो ने कुछ नहीं कहा। उसकी चुप्पी ही उत्तर थी।

साधु उसे धर्मशाला ले गया।
पहली बार किसी ने उसे प्रश्नों से अधिक अपनापन दिया।

वर्ष बीतते गए।
साधु जहाँ जाता, साधो साथ जाता।
भिक्षा में जो मिलता, वही दोनों खाते।

धीरे-धीरे भीतर का आक्रोश तपकर धैर्य में बदल गया।

ग्यारह साल का बालक
इक्कीस वर्ष का युवा बन गया।

ग्यारह साल का बालक
इक्कीस वर्ष का युवा बन गया।
......
दीक्षा का क्षण
एक सुबह, जब सूरज की पहली किरणें मंदिर की सीढ़ियों को छू रही थीं, साधु ने साधो को अपने पास बुलाया।
“समय आ गया है,” उन्होंने शांत स्वर में कहा, “अब तुम्हें संसार से नहीं, अपने भीतर से जुड़ना है।”
नदी के किनारे एक छोटा-सा उपक्रम हुआ।
साधो ने स्नान किया — जैसे बीते वर्षों का हर दुःख, हर अपमान जल में बहा रहा हो।
फिर साधु ने उसके सिर पर हाथ रखा, उसके बाल उतारे गए —
हर गिरता हुआ बाल मानो उसके पुराने नाम, पुराने दर्द और उस मासूम बच्चे की यादों को विदा कर रहा था।
उसे गेरुए वस्त्र पहनाए गए।
माथे पर भस्म लगाई गई।
साधु ने उसके कान में मंत्र फूँका —
धीरे, गहरे, जैसे आत्मा को छूता हुआ कोई स्वर।
“आज से तुम केवल साधो नहीं… एक साधक हो,”
उन्होंने कहा, “अब तुम्हारा पहला कर्तव्य है — अपनी माँ से भिक्षा लेना। वही तुम्हारे इस नए जीवन की पहली सीढ़ी होगी।”
साधो की आँखें नम हो गईं।
सालों से दबा हुआ एक कोना फिर से धड़क उठा —
माँ…
उसने पहली बार महसूस किया,
संन्यास त्याग नहीं होता,
सबसे गहरे प्रेम की अग्नि से होकर गुजरना होता है।
और फिर…
कमंडल हाथ में लिए,
धीमे कदमों से
वह अपने गाँव की ओर चल पड़ा।

संन्यास से पहले नियम था —
माँ के चरण स्पर्श कर पहली भिक्षा लेना।

संन्यास से पहले नियम था —
माँ के चरण स्पर्श कर पहली भिक्षा लेना।

साधो अपने गाँव लौटा।

कोई उसे पहचान न सका।
पर वह घर की एक-एक बात जानता था।

लोग उसके ज्ञान से प्रभावित हुए। माँ-पिता भी भीड़ में खड़े सुन रहे थे।

जब भिक्षा का समय आया, उसने कहा —
“पहली भिक्षा माँ से चाहिए।”

माँ काँपते हाथों से अन्न लेकर आईं।
वह झुका।

माँ पीछे हट गईं ...
“आप संत हैं। मुझे पाप का भागी मत बनाइए।”

उसकी आवाज़ धीमी थी —
“क्या आप अपने पुत्र को भी आशीर्वाद नहीं देंगी?”

माँ का चेहरा बदल गया।
“पुत्र…?”

और फिर उसने सब कह दिया।

स्कूल।
डंडा।
मुड़ते हुए कदम।

माँ वहीं बैठ गईं। आँसू रुक नहीं रहे थे।
“तुझे कहाँ नहीं ढूँढा…”

घर रो रहा था — खोने के भी आँसू, पाने के भी।


“अब मत जाओ,” माँ ने कहा।

साधो शांत था।
“अब मैं लौट नहीं सकता। पर दूर भी नहीं जाऊँगा।”

अंततः निर्णय हुआ —
वह गाँव के मंदिर में मठ बनाकर रहेगा।

घर का होकर भी, घर से अलग।

कुछ समय बाद वही अध्यापक उसके पास आए। आँखों में पश्चाताप था।

साधो ने उन्हें देखा।
फिर धीरे से कहा —

“जिस दिन आपने मुझे दंड दिया,
उस दिन मैं टूट गया था।
पर उसी दिन से मैं खोज में निकल पड़ा।
आज मैं आपको दोष नहीं देता।”

अध्यापक रो पड़े।

मठ के आँगन में आज भी एक टूटी लकड़ी की कुर्सी रखी है —
स्मरण के लिए।

कि किसी बच्चे की आवाज़ को दबाने से पहले,
उसकी आँखों में झाँक लेना चाहिए।



शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

रंग जो कभी वापस नहीं आते


होली का त्योहार है।

बाहर शोर है।
ढोल की थाप है।
लोगों की हँसी है।
रंग हवा में उड़ रहे हैं — जैसे हर कोई आज अपने भीतर का उन्माद बाहर फेंक देना चाहता हो।

कोई किसी पर गुलाल मल रहा है।
कोई कीचड़ फेंक रहा है।
कोई सिर्फ पानी उछालकर भी खुश है।

त्योहारों में लोग सीमाएँ भूल जाते हैं।
और भीड़ में व्यक्ति अक्सर अपना चेहरा भी।

वह खिड़की के पास बैठी है।

बाहर देख रही है —
पर सच तो यह है कि वह बाहर नहीं देख रही।

उसकी आँखें भीड़ के पार कहीं और अटकी हुई हैं।

रंगों का यह शोर
उसके भीतर एक और शोर जगा देता है —
स्मृतियों का।

होली उसके लिए त्योहार नहीं है।
एक तारीख़ है।
एक ऐसा दरवाज़ा, जो हर साल खुल जाता है —
और वह फिर उसी जगह खड़ी मिलती है।


---

धीरे-धीरे उसकी आँखों में गाँव उभरता है।

छोटा-सा घर।
कच्चा आँगन।
पीछे खेत।
दूर तक फैली हरियाली।

माँ।
पिता।
तीन बच्चे।

वह सबसे बड़ी।
दोनों भाई उसके पीछे-पीछे घूमते रहते।

घर में कमी नहीं थी।
अभाव नहीं था।
संतोष था।

खेत लहलहाते थे।
पेड़ों पर फल झूमते थे।
गौशाला में गायों की धीमी-धीमी घंटियाँ बजती थीं।

जीवन में साधन भले सीमित थे,
पर अपनापन प्रचुर था।


---

फिर एक दिन —
सब कुछ बिना शोर किए बदल गया।

माँ खेत में काम कर रही थी।

किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वह आख़िरी दिन होगा।

हृदय की गति थमी —
और घर की धड़कन भी।

माँ के जाने की आवाज़ नहीं हुई।
पर उसके बाद घर की हर आवाज़ बदल गई।

रसोई वही थी।
दीवारें वही थीं।
पर भीतर से घर का तापमान ठंडा हो गया था।

बारह साल की बच्ची ने पहली बार समझा —
ज़िम्मेदारी उम्र देखकर नहीं आती।

उसने खेलना छोड़ा नहीं,
पर खेलना भूल गई।

उसने खाना बनाना सीखा।
भाइयों की कॉपियाँ सँभालीं।
पिता के चेहरे की थकान पढ़ना सीखा।

उस उम्र में जब बच्चियाँ गुड़ियों से घर बसाती हैं,
उसने सचमुच घर संभाला।


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गाँव छोटा था।
और छोटे गाँवों में नज़रें बड़ी होती हैं।

कुछ लड़के —
उम्र में थोड़े बड़े —
रास्तों पर खड़े रहते।

उनकी हँसी सामान्य नहीं होती थी।
उनकी निगाहें भी।

वह चुप रहती।
अनसुना करती।
तेज़ कदमों से निकल जाती।

वह जानती थी —
अगर पिता को बताया, तो शायद पढ़ाई रुक जाएगी।

और पढ़ाई ही उसका रास्ता थी।


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समय बीता।

उसने बारहवीं पास की।

पढ़ने की जिद रखी।

दूर कॉलेज का फॉर्म भरा।

जीवन कठिन था,
पर दिशा थी।


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फिर वह शाम आई।

सूरज ढल रहा था।

उसे याद आया —
गाय के लिए घास नहीं लाई।

पिता ने रोका भी —
“शाम हो गई है।”

पर ज़िम्मेदारी आदत बन चुकी थी।

वह दरांती लेकर निकल गई।

खेतों में सन्नाटा था।
सांझ धीरे-धीरे धरती पर उतर रही थी।

और उसे यह आभास भी नहीं था
कि कोई उसकी पीठ पर नज़र गड़ाए हुए है।


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अचानक वह सामने आ खड़ा हुआ।

वही।

जिसकी नज़रें अक्सर उसका पीछा करती थीं।

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

पकड़ में अधिकार नहीं,
ज़बरदस्ती थी।

हँसी में हल्कापन नहीं,
ज़िद थी।

उस पल उसे पहली बार समझ आया —
डर सिर्फ शरीर को नहीं जकड़ता,
आवाज़ को भी जकड़ लेता है।

उसका गला सूख गया।

“रास्ता छोड़ दो…”

वह हँसा।

उसकी पकड़ और कस गई।

उसे लगा —
अँधेरा सिर्फ चारों ओर नहीं, भीतर भी उतर रहा है।

फिर —
न जाने कहाँ से ताक़त आई।

उसने हाथ छुड़ाया।

और एक तेज़ थप्पड़।

उस आवाज़ में उसका डर नहीं,
उसकी मर्यादा थी।

वह तिलमिलाया।

और उसने भागना चुना।

दौड़ते हुए उसे लगा —
साँसें पीछे छूट रही हैं।

पीछे से आवाज़ आई —
“महँगा पड़ेगा!”

यह धमकी शब्द नहीं थी।
एक छाया थी, जो उसके साथ घर तक आई।


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घर पहुँचकर वह सच नहीं कह पाई।

क्योंकि सच बोलने से पहले ही
उसे परिणाम दिखने लगे थे।

उसने झूठ बोला।

उस रात उसने जाना —
डर बाहर से अधिक भीतर रहता है।

और धमकी समय के साथ पुरानी नहीं होती,
गहरी होती है।


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एक महीना बीता।

होली आई।

घर में तैयारी थी।

छोटा भाई बेहद खुश था।

उम्र कम थी।
विश्वास ज़्यादा।

कुछ लड़कों ने उसे अपने साथ मिला लिया।

मासूमियत को पहचानना आसान होता है।

होली की रात —
वह उनके साथ चला गया।

रात बीती।

सुबह हुई।

वह नहीं लौटा।

दोपहर तक बेचैनी डर बन चुकी थी।

फिर खबर आई।

खेत में कोई पड़ा है।

वे दौड़े।

बीच में वह था।

निश्चल।

उसका छोटा भाई।

गला काटा हुआ।

खून से भीगे कपड़े।

होली का रंग उस दिन अलग था।

लोग जानते थे शक किस पर है।

पर कोई बोला नहीं।

डर ने सच को बाँध रखा था।


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पिता की आँखें सूख चुकी थीं।

माँ के बाद
अब बेटा।

घर का आँगन फिर खाली हो गया।

और उसके भीतर एक सवाल हमेशा के लिए बैठ गया —

क्या उस थप्पड़ की गूँज यहाँ तक आई थी?

कभी-कभी उत्तर नहीं मिलते।
सिर्फ़ बोझ रह जाता है।


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पिता ने गाँव छोड़ दिया।

ज़मीन गई।
खेत गए।
पर बच्चों को बचाना ज़रूरी था।


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अब साल बीत चुके हैं।

वह शहर में है।

जीवन आगे बढ़ चुका है।

पर हर साल —
जब फाल्गुन की हवा चलती है,
जब कोई “होली है!” चिल्लाता है —

उसके भीतर वही खेत उग आते हैं।

वही सांझ।

वही थप्पड़।

वही धमकी।

वही खून।

कुछ रंग सचमुच वापस नहीं आते।

और इसलिए —
वह होली नहीं मनाती।



खून की होली

होली का त्योहार है। बाहर हुड़दंग मची हुई है। जिसका जो मन कर रहा है, जो हाथ में पड़ रहा है, वह दूसरे पर डाल दे रहा है—चाहे वह रंग हो, गुलाल हो, अबीर हो या कीचड़, या कुछ भी चीज, या खाली पानी ही क्यों न हो।
वह खिड़की में बैठी इस नज़ारे का बिल्कुल भी आनंद नहीं ले रही थी। बल्कि इस उन्माद को देखकर वह और अधिक दुखी हो रही थी। होली का त्योहार उसकी ज़िंदगी का सबसे मनहूस त्योहार था, क्योंकि होली हर बार उसे कुछ ऐसा याद दिला देती थी कि उसका दिल पीड़ा से कराह उठता था।
होली की इस हुड़दंग में खोई उसकी आँखों में अपने गाँव की वह सुंदर-सी तस्वीर धीरे-धीरे उभर आई—उनका छोटा-सा घर, खेत-खलिहान, माँ-बाप और तीन भाई-बहन, जिनमें वह सबसे बड़ी थी और दोनों भाई उससे छोटे।
हँसता-खेलता परिवार। कई बीघा ज़मीन। फसलों से लहलहाते खेत। कई तरह के फलों से लदे पेड़। गौशाला में दुधारू गाएँ। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी उस घर में।
तीनों बच्चे माँ-बाप का भरपूर प्यार पाते थे। तीनों में बड़ा मेल-मिलाप था। माँ-बाप भी बच्चों को देखकर संतुष्ट और प्रसन्न रहते थे। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था… जीवन जैसे अपनी सहज लय में बह रहा था।
लेकिन एक दिन उसकी माँ खेत में काम कर रही थी। न जाने उसकी हृदय गति कैसे रुक गई। बहुत कम उम्र में ही वह अपनी दुनिया को अलविदा कह गई।
उस दिन जैसे घर की दीवारें तो वही रहीं, पर घर का दिल धड़कना बंद हो गया।
माँ चली गई। घर सूना हो गया। माँ के बिना भला घर भी घर रह जाता है क्या?
तीनों बच्चे तब तक किशोरावस्था की दहलीज़ तक भी नहीं पहुँचे थे। उन पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था। पिता भीतर से टूट चुके थे। वे अक्सर उदास रहने लगे थे, पर तीन बच्चों का भरण-पोषण करना था, उनका ध्यान रखना था। सिर्फ दुख में डूबे रहकर जीवन नहीं चलता।
उन्होंने दूसरी शादी करने का विचार तक नहीं किया। उन्होंने बच्चों को अपने स्नेह और जिम्मेदारी से पाला।
छोटी-सी बेटी, जिसकी उम्र मात्र बारह वर्ष थी, उसने घर को संभाल लिया — एक माँ की तरह। चूल्हा-चौका, बर्तन, खाना बनाना… सब उसने सीख लिया। साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। वह दोनों छोटे भाइयों का भी भरपूर ख्याल रखती।
दिन इसी तरह बीतते गए। धीरे-धीरे माँ के चले जाने का घाव ऊपर से थोड़ा भरने लगा, पर भीतर की पीड़ा पूरी तरह कभी कम नहीं हुई। माँ की याद आज भी हर छोटे-बड़े अवसर पर चली आती थी।
घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी — जमीन, खेत-खलिहान, फलों से लदे पेड़, गौशाला में गायें — सब कुछ था। फिर भी एक कमी थी — सुविधाओं की। पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता था। रोजमर्रा का सामान भी कई किलोमीटर दूर से लाना पड़ता था। गाँव दूरस्थ था, जहाँ सुख-सुविधाएँ सीमित थीं।
पिता गाँव छोड़ना नहीं चाहते थे। पैतृक संपत्ति, जमीन-जायदाद, पीढ़ियों की मेहनत — उसे यूँ ही कैसे छोड़ देते? इसलिए उन्होंने वहीं रहकर सब संभालने का निश्चय किया।
बच्चे रोज कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाते और उतनी ही दूरी तय करके वापस लौटते।
उसी गाँव में कुछ और लड़के थे, जो उम्र में उनसे थोड़े बड़े थे। वे भी साथ-साथ बड़े हो रहे थे, पर उनकी नीयत साफ़ नहीं थी। आते-जाते वे छोटी लड़कियों को छेड़ते, भद्दी बातें करते।
लड़की और उसके भाई अक्सर इन बातों को अनसुना कर देते। वह अपने पिता को यह सब बताना भी नहीं चाहती थी। वह जानती थी — अगर पिता को यह बात पता चली, तो शायद वे उसकी पढ़ाई छुड़वा देंगे।
और पढ़ाई के अलावा उसके पास आगे बढ़ने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
गाँव के एक बदमाश लड़के की नज़र कब से उस पर थी। बस उसे कभी वह अकेले नहीं मिली, इसलिए अब तक वह बची रही। कई दिनों से वह उसकी ताक में था।
समय यूँ ही बीतता गया। बचते-बचाते लड़की ने बारहवीं की पढ़ाई भी पूरी कर ली। दोनों भाई उससे दो-दो साल छोटे थे, उनकी पढ़ाई भी चल रही थी। वह किसी तरह अपना भी ध्यान रखती और दोनों भाइयों का भी ख्याल करती।
बारहवीं पास करने के बाद उसने ग्रेजुएशन करने का निश्चय किया। उसने दूसरे गाँव के डिग्री कॉलेज में प्राइवेट फॉर्म भर दिया। परीक्षा देने के लिए उसे काफी दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था।
घर का सारा काम वह करती ही थी। गौशाला में एक बहुत ही बढ़िया दुधारू गाय थी। उस गाय को रोज़ ताज़ी, हरी घास चाहिए होती थी। वह प्रतिदिन दिन में घास काटकर उसके लिए रख देती थी। बाकी भारी काम उसके पिता संभालते थे।
एक दिन ऐसा हुआ कि वह किसी काम में उलझ गई और गाय के लिए घास नहीं ला पाई। शाम ढलने लगी तो अचानक उसे याद आया —
“अरे… गाय के लिए घास तो लानी ही है।”
सूरज लगभग ढल चुका था। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। खेतों की तरफ़ सन्नाटा उतर रहा था…
और वह दरांती उठाकर बाहर निकल गई।
बाहर निकलते हुए पिता ने उसे आवाज़ दी और टोका —
“बेटी, इस समय कहाँ जा रही हो?”
उसने जल्दी से उत्तर दिया —
“पिताजी, गाय के लिए घास लाना आज भूल गई। बहुत ज़रूरी है घास लाना।”
पिता कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले —
“ज़रूरी तो है, बेटा… लेकिन यह समय घर से बाहर निकलने का नहीं है। अगर जाना ही है, तो जल्दी लौट आना। और अगर घास न मिले, तो कहीं इधर-उधर मत भटकना।”
उसने “हाँ” में सिर हिलाया। घास की टोकरी उठाई, दरांती हाथ में ली और तेज़ क़दमों से निकल पड़ी।
इधर-उधर देखा — पर कहीं ताज़ी घास नहीं दिखी। लोग दिन में ही काट ले गए थे, या गाय-भैंस चर चुकी थीं। खेत लगभग खाली थे।
लेकिन घास लाना ज़रूरी था।
वह आगे बढ़ती गई… तेज़ क़दमों से… फिर लगभग दौड़ती हुई।
उसे यह बिल्कुल पता नहीं था कि दो नज़रें उसके पीछे-पीछे चल रही थीं।
उसे इसका आभास भी नहीं हुआ, क्योंकि उसका सारा ध्यान सिर्फ़ घास ढूँढने में लगा था।
शाम अब और गहरा रही थी
वे आँखें धीरे-धीरे उसके और निकट आती गईं…
और अचानक वह उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सब कुछ जैसे एक क्षण में थम गया।
उसने झटके से उसका हाथ पकड़ लिया।
हँसी में एक अजीब-सी अकड़ थी —
“डरने की क्या बात है? हम तो तुम्हारे पुराने चाहने वाले हैं… बस समझ लो, आज मुलाक़ात हो गई।”
वह सिहर उठी। उसकी पकड़ कड़ी होती जा रही थी।
“एक दिन नहीं… दो दिन नहीं… सालों से इस दिन का इंतज़ार किया है मैंने,” वह धीमे लेकिन दबाव भरे स्वर में बोला।
लड़की का गला सूख गया। वह काँपती आवाज़ में बस इतना कह पाई —
“मेरा रास्ता छोड़ दो…”
वह हँसा —
“इतने सालों की तपस्या के बाद पहली बार तो मिली हो… और मैं यूँ ही जाने दूँ?”
वह एक कदम और बढ़ा।
शाम का अँधेरा अब और गहरा चुका था।
उसके हाथों से टोकरी छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। दरांती भी दूर जाकर खनकती हुई गिरी।
डर से उसके पसीने छूट रहे थे। वह पीछे हटने लगी… पर पीछे अब सिर्फ खाली खेत और फैलता अँधेरा था।
उसने उसके दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए।
उसकी पकड़ में एक अजीब-सी ज़िद और हिंसक अधीरता थी।
लड़की पूरी ताक़त से छूटने की कोशिश करने लगी। उसने हाथ-पैर झटके, शरीर को मोड़ा, आवाज़ लगाई।
न जाने कहाँ से उसके भीतर अचानक साहस उमड़ आया। उसका एक हाथ उसकी पकड़ से छूट गया।
छूटते ही उसने पूरी ताक़त से उसके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया।
इतना तेज़ कि वह पल भर को तिलमिला उठा।
उसी क्षण का फायदा उठाकर उसने दूसरा हाथ भी छुड़ा लिया।
वह बिना पीछे देखे दौड़ पड़ी।
दुपट्टा वहीं छूट गया। टोकरी और दरांती खेत में पड़ी रह गईं।
पीछे से उसकी कर्कश आवाज़ आई —
“इस थप्पड़ का जवाब तुझे बहुत महँगा पड़ेगा… याद रखना!”
पर वह रुकी नहीं।
उसके कानों में बस अपनी धड़कनों की आवाज़ गूँज रही थी।
वह हड़बड़ाती हुई घर पहुँची।
उसकी धड़कनें अब भी बेकाबू थीं। साँसें तेज़ चल रही थीं। आँखें नम थीं। और दुपट्टा… वह तो खेत में ही छूट गया था।
पिता आँगन में बेचैनी से उसका इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही वह भीतर आई, उसकी हालत देखकर घबरा उठे।
“अरे, क्या हुआ? तुम्हारे साथ क्या हुआ? ऐसे क्यों काँप रही हो? कुछ हुआ है क्या?”
वह कुछ क्षण तक चुप खड़ी रही। उसकी छाती उठ-गिर रही थी। शब्द गले में अटक रहे थे।
गाँव का माहौल ऐसा था जहाँ अंधेरे और परछाइयों को लोग अक्सर भूत-प्रेत से जोड़ देते थे। शाम ढलने के बाद अकेले बाहर जाना वैसे ही अच्छा नहीं माना जाता था।
उसने उसी डर का सहारा लिया।
धीरे से बोली —
“मैं… मैं घास काटने के लिए झुकी थी, तभी लगा जैसे कोई छाया पास आ रही हो… बहुत पास… मुझे लगा कोई है वहाँ… मैं डर गई पिताजी… और भाग आई।”
उसने नज़रें नीचे कर लीं।
पिता ने गहरी साँस ली।
“कितनी बार कहा है शाम ढलने के बाद मत जाया करो,” उन्होंने हल्की झुंझलाहट और चिंता के मिश्रण से कहा।
उन्होंने उसे अंदर जाने को कहा।
“ठीक है, आज रहने दो। सुबह देख लेंगे।”
वह चुपचाप भीतर चली गई।
पर कमरे में पहुँचते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह जानती थी —
वह झूठ बोल आई है।
पर सच बोलने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
सच से पिता की चिंता बढ़ जाती… और शायद उसकी दुनिया सिमट जाती।
उस रात उसने पहली बार महसूस किया —
डर सिर्फ बाहर नहीं होता,
डर भीतर भी घर बना लेता है।
लड़के की दी हुई धमकी उसके मन में घर कर चुकी थी।
उसे हर समय यही लगता — वह कुछ न कुछ अवश्य करेगा। वह ऐसा व्यक्ति नहीं था जो अपमान सहकर चुप बैठ जाए। गाँव में उसका नाम ही बदमाशी के लिए था। जब वह औरों को नहीं छोड़ता, तो उसे क्यों छोड़ देगा?
उसके भीतर एक स्थायी डर बैठ गया था।
अब हाल यह था कि जिस दिन पिता या भाई घर आने में थोड़ी-सी भी देर कर देते, उसका मन अनहोनी की आशंका से भर उठता। हर आहट पर वह चौंक जाती। हर परछाईं उसे किसी खतरे की तरह लगती।
इस घटना को लगभग एक महीना बीत चुका था।
और अब होली आ गई थी।
घर में होली की तैयारी चल रही थी।
गुजिया बन रही थीं। मिठाइयाँ तैयार की जा रही थीं। रंग और अबीर की छोटी-छोटी पोटलियाँ बाँधी जा रही थीं।
वह भी काम में लगी हुई थी। दोनों भाई थोड़ा-थोड़ा हाथ बँटा रहे थे। बड़ा भाई कुछ समझदार हो चला था, पर छोटा भाई अभी भी बहुत मासूम था — उम्र कोई सोलह-सत्रह वर्ष रही होगी।
इसी मासूमियत का फायदा उन बदमाश लड़कों ने उठाया।
उन्होंने उससे बातचीत शुरू की। हँसी-मज़ाक किया। कुछ ही दिनों में उसे अपना “दोस्त” बना लिया। वे उम्र में उससे बड़े थे, बातें भी ऐसी करते कि वह उन पर भरोसा कर बैठा।
होली का दिन आ गया।
उन्होंने उसे अलग से कहा —
“आज रात पार्टी करेंगे। तू भी आना… घर में किसी को मत बताना। असली मज़ा तो रात की होली में है।”
गाँव में प्रायः रात को भी होली का आयोजन होता था। लोग फाग गाते, ढोलक बजती, कई जगह दावतें होतीं। कुछ लोग नशा भी करते। गीत, नाच, शोर — सब कुछ मिलकर एक अलग ही माहौल बना देता।
छोटा भाई उनकी बातों में आ गया।
उसे लगा, दोस्तों के साथ होली मनाने में क्या बुराई है।
रात को वह घर से यह कहकर निकला कि वह दोस्तों के साथ होली खेलने जा रहा है…
और उन लोगों के साथ दावत में चला गया।
उस रात किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चला कि दावत में उसके साथ क्या हुआ।
होली का दिन था। रात तक बाहर रहना असामान्य नहीं माना जाता था।
पर जब आधी रात बीत गई और वह घर नहीं लौटा, तो पिता की बेचैनी बढ़ने लगी। बड़ा भाई भी चिंतित हो उठा।
“कहाँ चला गया होगा?”
वे पड़ोसियों के घर गए। आसपास पूछताछ की।
किसी को कुछ मालूम नहीं था।
आख़िर उन्होंने सोचा —
शायद दोस्तों के साथ कहीं सो गया हो, सुबह आ जाएगा।
सुबह हुई।
दोपहर होने लगी।
पर वह नहीं आया।
पिता और बड़ा भाई उसके उन तथाकथित “दोस्तों” के घर गए।
उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया —
“वह हमारे साथ नहीं था।”
अब चिंता डर में बदल चुकी थी।
तीनों घर के आँगन में बैठे थे — भारी मन, सूनी आँखें, अनकहे भय के साथ।
तभी गाँव का ही एक आदमी हाँफता हुआ आया। उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ झलक रही थी।
वह कुछ क्षण शब्द ही नहीं जुटा पाया।
फिर टूटती आवाज़ में बोला —
“खेत की तरफ… करन सिंह के खेत में… कोई पड़ा है… लगता है… आपका बेटा…”
इतना सुनना था कि जैसे ज़मीन खिसक गई।
पिता, बड़ा भाई और वह — तीनों बदहवासी में उधर दौड़े।
खेत में भीड़ जमा थी।
बीच में उसका छोटा भाई निश्चल पड़ा था।
उसका गला किसी ने निर्ममता से काट दिया था।
कपड़े खून से भीगे हुए थे।
होली का रंग…
उस दिन किसी और रंग में बदल चुका था।
गाँव के लगभग हर व्यक्ति को भीतर-ही-भीतर अंदाज़ा था कि यह किसका काम हो सकता है।
पर कोई इतना साहसी नहीं था कि खुलकर नाम ले सके।
न कोई गवाही देने को तैयार था,
न कोई सच कहने को।
सबको अपनी-अपनी ज़िंदगी प्यारी थी।
वह बीहड़-सा गाँव था —
जहाँ पुलिस सिर्फ नाम भर की थी,
जहाँ कानून कागज़ों में था,
और असली कानून कुछ दबंग लोगों की मुट्ठी में।
उनकी दहशत के नीचे ही लोग जीते थे।
उसी भय के साए में बच्चे बड़े होते थे।
सबने दुख जताया।
सबने अफ़सोस किया।
होली की खुशियाँ अचानक शोक में बदल गईं।
पर कोई भी उस जड़ तक नहीं पहुँचा
जिसने यह सब किया था —
जबकि हर मन जानता था कि शक किस पर है।
लड़की के पिता के सिर पर जैसे एक और वज्र गिर पड़ा।
पहले पत्नी को खोया था।
आज अपने बेटे को खो दिया।
उनकी आँखों में आँसू कम थे —
शायद क्योंकि आँसू भी अब सूख चुके थे।
घर का आँगन, जहाँ कुछ दिन पहले तक गुजिया बन रही थीं,
अब वहीं मातम पसरा था।
और उस लड़की के भीतर…
एक ऐसा तूफ़ान उठ चुका था
जिसे कोई देख नहीं पा रहा था।
खून की वह होली बीत चुकी थी।
अंतिम संस्कार हो चुका था।
रिश्तेदार लौट गए।
गाँव फिर से अपनी सामान्य चुप्पी में डूब गया।
पर उस घर में कुछ भी सामान्य नहीं था।
एक शाम, जब आँगन में सन्नाटा था,
पिता ने दोनों बच्चों को अपने पास बिठाया।
उनकी आवाज़ भारी थी —
पर निर्णय स्पष्ट।
“हम यह गाँव छोड़ देंगे।”
यह शब्द सुनते ही जैसे हवा भी ठहर गई।
वह जानते थे —
यहाँ न्याय नहीं मिलेगा।
यहाँ सुरक्षा नहीं है।
और वे अपने बचे हुए बच्चों को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते।
जमीन…
खेत…
खलिहान…
पूर्वजों की मिट्टी…
सब कुछ पीछे छूटने वाला था।
पर पिता के लिए सबसे कीमती उनकी संतान थी —
न कि संपत्ति।
कुछ ही दिनों में उन्होंने सब समेट लिया।
कुछ ज़मीन औने-पौने दामों में दे दी।
कुछ यूँ ही छोड़ दी।
और एक सुबह —
वे उस गाँव को हमेशा के लिए अलविदा कहकर चले गए।
नए शहर में जीवन शुरू तो हुआ,
पर स्मृतियाँ पीछे नहीं छूटीं।
हर साल जब होली आती —
लोग रंगों की बातें करते,
मिठाइयों की खुशबू फैलती,
ढोलक बजती —
तो उसकी आँखों के सामने वही खेत आ जाता।
वही चिल्लाहट।
वही धमकी।
वही खामोशी।
होली उसके लिए त्योहार नहीं रही।
वह एक तारीख़ बन गई —
जिसने उसका बचपन छीन लिया।
साल बीत चुके हैं।
गाँव पीछे छूट चुका है।
जीवन ने नया रूप ले लिया है।
पर कुछ स्मृतियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं।
हर वर्ष जब फाल्गुन की हवा चलती है,
जब गलियों में रंग घुलते हैं,
जब बच्चे “होली है!” चिल्लाते दौड़ते हैं —
वह खिड़की के पास आकर बैठ जाती है।
उसकी आँखें बाहर नहीं देखतीं —
वे भीतर देखती हैं।
उसे फिर वही खेत दिखाई देता है।
वही सांझ।
वही डर।
वही धमकी।
और फिर…
उसका छोटा भाई — कैलाश।
मासूम मुस्कान वाला चेहरा।
हाथों में अबीर लिए दौड़ता हुआ।
और अगली ही स्मृति में —
सब कुछ शून्य।
उसकी पलकों के कोनों में नमी भर आती है।
वह आँसू पोंछती नहीं।
बस बह जाने देती है।
घर में उस दिन कोई रंग नहीं घुलता।
न पिचकारी निकलती है।
न गुजिया बनती है।
होली उनके घर में त्योहार नहीं —
एक तारीख़ है।
एक घाव है।
एक अधूरी आवाज़ है।
वह जानती है —
कुछ रंग कभी वापस नहीं आते।
और इसलिए…
वह होली नहीं मनाती।
शायद कभी नहीं मनाएगी।


गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

कुछ रिश्ते टूटे नहीं... खामोश हो जाते हैं..

मई की चिलचिलाती दोपहर।
सन्नाटे से भरा कमरा।
खिड़की से आती गर्म हवा सायं-सायं करती भीतर उतर रही थी।
कोने में लगे डबल बेड पर बिछी सफेद चादर पर रखी किताब के पन्ने हवा के झोंकों से अनमने ढंग से पलट जाते।
कमरे में हलचल थी, पर वातावरण में एक गहरी खामोशी पसरी हुई थी।
उसी खामोशी के बीच, खिड़की के पास वह लड़की खड़ी थी।
हाथ में मोबाइल।
उंगलियाँ तेज़ी से स्क्रीन पर फिसलतीं, फिर ठहर जातीं।
वह व्हाट्सऐप खोलती।
एक नाम खोजती।
डीपी पर टिक जाती।
कुछ क्षण।
एकटक।
फिर वापस। होम स्क्रीन।
और कुछ ही देर बाद — वही क्रम दोबारा।
उस तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ प्रकृति की एक साधारण-सी छवि।
फिर भी वह जैसे उस तस्वीर में कोई उत्तर तलाश रही थी।
वह गहरी साँस लेकर खिड़की से दूर देखने लगी।
उसकी स्थिर आँखों में न जाने कितने दृश्य एक साथ तैर उठे।
वह मुस्कुराता चेहरा।
अपेक्षा से कहीं अधिक देखभाल करने वाला व्यवहार।
दिन-ब-दिन मज़बूत होता वह रिश्ता…
आज वही रिश्ता किस कगार पर आ खड़ा हुआ है।
कुछ स्मृतियों पर उसके होंठ हल्के-से मुस्कुरा उठते हैं,
और कुछ पर वह अनायास ही अपने आँसू पोंछ लेती है।
उसे वह पहली बातचीत याद आती है —
जो शाम से शुरू होकर अगले दिन की सुबह तक चली थी।
शायद वह ख़त्म भी न होती, अगर दिन की रोशनी ने उनके शब्दों के बीच प्रवेश न किया होता।
अब उसे हर शाम का बेसब्री से इंतज़ार रहने लगा था।
दिन चाहे जितना भी व्यस्त बीते,
शाम होते ही उसका मन एक ही नाम पर ठहर जाता।
दो हृदयों के बीच बोया गया भावनाओं का बीज धीरे-धीरे अंकुरित हो रहा था।
कुछ ही दिनों में वह एक नन्हा-सा पौधा बनकर विश्वास की धूप में लहराने लगा।
पर हर चमक की अपनी उम्र होती है।
वह चिंगारी जो शुरू में दोनों को रोशन करती थी, धीरे-धीरे एक ओर मंद पड़ने लगती,
और दूसरी ओर और अधिक भड़क उठती।
वह अनजाने में अपने समूचे संसार को एक ही व्यक्ति के चारों ओर बुनने लगी थी।
दुनियावी रिश्ते पीछे छूटते गए।
उसकी हँसी, उसकी प्रतीक्षा, उसकी दिनचर्या —
सब उसी से जुड़ गई।
पर शायद प्रेम का भार हर कोई एक-सा नहीं उठा पाता।
उसका बढ़ता समर्पण, जो उसके लिए जीवन था,
शायद उसके लिए एक अनकहा दबाव बनने लगा।
और यहीं से संतुलन डगमगाने लगा।
उफ़… प्रेम की यही तो विडंबना है।
जब तन्मयता दोनों ओर से बहती है, तो वह स्वर्ग-सी शांति देती है।
पर यदि वह एक ही दिशा में सिमट जाए,
तो वही प्रेम धीरे-धीरे एक आदत बन जाता है —
ऐसी आदत, जिसके छूटने पर भीतर बेचैनी जन्म लेती है।
वह बार-बार स्वयं को समझाती है,
पर मन किसी पुनर्वास की नहीं सुनता।
वह उसी नाम, उसी स्मृति, उसी प्रतीक्षा की ओर लौट जाता है।
तेरह घंटे की वह पहली बातचीत धीरे-धीरे तेरह मिनट में सिमट आई।
फिर कुछ सेकंड।
और एक दिन — पूर्ण शून्य।
समय तो वही था, पर प्राथमिकताएँ बदल गई थीं।
जब वह मुक्त था और वह व्यस्त,
उसने अपने समय को मोड़कर उसकी दुनिया में जगह बना ली थी।
पर जब वह स्वयं हल्की हुई, वह बोझिल होने लगा।
शायद सचमुच व्यस्त था।
शायद नहीं।
पर प्रेम, जो कभी दोनों का उत्सव था, अब उसके लिए एक अतिरिक्त कार्य-सा हो गया था।
समय के साथ उसकी महत्वाकांक्षाएँ फैलती गईं, और उनके साथ उसकी व्यस्तताएँ भी।
लड़की, जिसने अपने छोटे-छोटे संसार को सिमटाकर केवल उसी तक सीमित कर लिया था,
हर बढ़ते अंतर को भीतर से महसूस करती।
वह शिकायत करती —
न इसलिए कि उसे समय चाहिए था,
बल्कि इसलिए कि उसे उपस्थिति चाहिए थी।
वह सुनता, फिर लगभग हर बार वही उत्तर देता —
“तू खाली है, इसलिए ज़्यादा सोचती है।
कुछ काम ढूँढ़ ले।
तुझे इतनी ज़रूरत नहीं पड़ेगी बात करने की।
मैं फ्री नहीं बैठा हूँ।
जो कर रहा हूँ… हमारे भविष्य के लिए कर रहा हूँ।”
उसके शब्दों में तर्क था।
पर उसके स्वर में वह गर्माहट नहीं रही, जिससे कभी रातें सुबह में बदल जाती थीं।
जिसने अपना सब कुछ उसी के चरणों में रख दिया हो, उसके लिए ये शब्द असहनीय थे।
वह हैरान थी —
कभी उससे बात करने से पहले उसे अपना बनाने की कितनी तड़प हुआ करती थी।
एक दिन बिना देखे उसका हाल कैसा हो जाता था।
पहले साल में तो उसने एक भी दिन यूँ ही बिना बात किए जाने नहीं दिया था।
और आज… समय जैसे करवट बदल चुका था।
वह सोचती —
कब मैं उसकी प्राथमिकता से उसकी सूची के सबसे नीचे खिसक गई?
उसकी महत्वाकांक्षाएँ ऊँची होती गईं, और वह स्वयं छोटी पड़ती गई।
उसे लगता, अगर वह एक दिन चुप रह जाए, या उसकी दुनिया से अनुपस्थित हो जाए, तो शायद बहुत अंतर भी न पड़े।
और हर बार बात भविष्य पर टाल दी जाती —
उस भविष्य पर, जो अभी तक आया ही नहीं था।
पर अब चीज़ें दिन-ब-दिन विकृत होती जा रही थीं।
वह व्यस्त था —
उसे पैसा कमाना था।
इतना पैसा कि भविष्य सुरक्षित हो, सपने पूरे हों, दुनिया घूमी जाए।
पर उस भविष्य की दौड़ में आज का क्षण कहीं छूट गया था।
एक हृदय, जो उसके व्यवहार से रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूट रहा था,
उसकी चिंता अब उसके पास समय की सूची में नहीं थी।
जब कोई अपना सर्वस्व समर्पित कर दे और बदले में उदासीनता पाए, तो नाराज़गी स्वाभाविक है।
वह नाराज़ होती।
नाराज़गी झगड़ों में बदलने लगी।
धीरे-धीरे वह समय भी आ गया जब फ़ोन बात करने के लिए नहीं, झगड़ने के लिए उठाया जाता।
लड़की की अपेक्षाएँ और लड़के की उपेक्षा —
दोनों मिलकर रिश्ते को भीतर से खोखला करने लगीं।
कहाँ वे रातें, जहाँ शब्दों में प्रेम बहता था,
और कहाँ यह समय — जहाँ संवाद आरोपों में बदल गया।
एक दिन उसने कह दिया —
“तूने मेरे जीवन में ज़हर घोल दिया है।
अगर पता होता कि आगे चलकर तू ऐसी हो जाएगी,
तो मैं कभी तुझसे बात ही न करता।”
ये शब्द सुनकर उसका दिल जैसे भीतर ही भीतर बैठ गया।
वह देर तक सोचती रही —
आख़िर उसने माँगा ही क्या था?
समय? उपस्थिति? या बस वही अपनापन, जो कभी सहज मिला करता था?
एक दशक बीत गया।
उसे बार-बार लगता — शायद गलती उसी की है।
शायद वह ज़्यादा चाहती है।
शायद अपेक्षाएँ ही समस्या हैं।
उसने स्वयं को बदलने की कोशिश की।
अपनी अपेक्षाएँ घटाईं।
बात करने की आवृत्ति कम स्वीकार की।
लंबे कॉल्स की जगह संदेशों में ही जुड़े रहने को पर्याप्त मान लिया।
पर परिणाम वही रहा।
क्योंकि संदेश, संदेश ही होते हैं।
वे लिखने वाले के भावों की ऊष्मा पूरी तरह नहीं पहुँचा पाते।
धीरे-धीरे उसे उसके लंबे संदेश भी खलने लगे।
एक दिन उसने स्पष्ट कह दिया —
“लंबे मैसेज मत किया करो।
मैं पढ़ नहीं पाता।
कुछ कहना हो तो फ़ोन कर लिया करो।
मैसेज पढ़ने में मेरा सिर दर्द करने लगता है।”
उसने स्क्रीन पर टकटकी बाँधे काफ़ी देर तक वह वाक्य पढ़ा था।
कभी वही शब्द, जो रातों को सुबह में बदल देते थे, अब बोझ लगने लगे थे।
रिश्ता टूटा नहीं था।
बस अपाहिज़-सा घिसटता हुआ चल रहा था।
बात तो उससे करनी ही थी।
कई बार वह गुस्सा होती, उसकी खरी-खोटी सुनती,
फिर खुद ही माफ़ी माँग लेती —
“मेरी अपेक्षाएँ ज़्यादा हैं…
तुम्हारे बिना रह भी तो नहीं सकती।”
साल दर साल गुज़रते गए।
उसके व्यवहार में बदलाव और स्पष्ट होता गया।
कभी दोनों बातें साझा करते थे — अब केवल वही बोलती थी।
यह एकतरफ़ा वार्तालाप था।
सामने से “हूँ… हाँ…” बस इतना ही उत्तर मिलता।
धीरे-धीरे यही पैटर्न बन गया।
वह फोन करती, बात ख़त्म होने के बाद खुद को अजीब-सी बेइज़्ज़ती में डूबा पाती।
कुछ दिन चुप रह जाती।
सोचती — अब नहीं।
लेकिन उसके एक संदेश पर उसकी पटर-पटर फिर शुरू हो जाती।
जैसे भीतर संचित शब्द बस उसी एक संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों।
और फिर वही जवाब — “हूँ… हाँ…”
फोन कटने के बाद उसे एक असीमित पीड़ा का अनुभव होता।
जैसे उसने फिर अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया हो सिर्फ़ कुछ क्षणों की उपस्थिति के बदले।
उसे उसकी शिकायतों से चिढ़ थी।
उसकी अपेक्षाएँ उसे बोझ लगती थीं।
उसके आँसू उसे असहज कर देते थे।
वह किसी भी तरह की “नकारात्मक” बात सुनना नहीं चाहता था।
उसे बस हल्की, सहज, बिना प्रश्न वाली उपस्थिति चाहिए थी।
उसके भविष्य की अपनी योजनाएँ थीं — शायद पहली मुलाक़ात से ही।
वह जीवन को चरणों में बाँटकर देखता था —
अभी महत्वाकांक्षा, फिर स्थिरता, फिर शायद संबंध।
उसके लिए यह रिश्ता “जब तक चल सके” वैसा ही था।
पर लड़की के लिए — वह रिश्ता ही जीवन था।
वह उसमें पूर्णतः समर्पित थी।
उसने अपने वर्तमान, अपने सपने, अपनी प्राथमिकताएँ सब उसी एक धुरी पर टिका दी थीं।
वह साथ निभा रहा था।
वह साथ जी रही थी।
दोनों के निभाने में अंतर था,
एक के लिए रिश्ता विकल्प था, दूसरे के लिए अस्तित्व।
और यहीं से असंतुलन जन्मा।
बातें फिर भी होती रहीं — रोज़ नहीं, कभी-कभार।
अब वे संवाद नहीं रहे थे, एक औपचारिकता-से थे।
लड़की को अब एक बात साफ समझ आने लगी थी —
वह उसे जाने के लिए नहीं कह रहा था,
पर हर बार ऐसी परिस्थितियाँ बना देता कि वह स्वयं घुटकर पीछे हट जाए।
और होता भी यही था।
वह फ़ोन करती, सामने से “हूँ… हाँ…” बस इतना ही मिलता।
बातों में अपनापन समाप्त हो चुका था।
एक-दो दिन बात होती, फिर लंबा विराम।
कई बार तो महीने बीत जाते बिना किसी संवाद के।
उसका “हॉट एंड कोल्ड” व्यवहार उसे भीतर तक तोड़ देता।
एक पल सपने, दूसरे पल पूर्ण उदासीनता।
वह जानती थी — उस एक पल की खुशी के लिए वापस उसी पैटर्न में जाना खुद को फिर चक्की में पीस देना है।
फिर भी वह गई।
एक बार नहीं, कई बार।
पूरा एक वर्ष ऐसे ही बीता — महीनों की चुप्पी, फिर अचानक संवाद, फिर वही दूरी।
एक दिन उसका धैर्य टूट गया।
वह बहुत रोई।
बहुत कुछ कह दिया।
असल झगड़ा किसी शब्द का नहीं था —
झगड़ा उसकी अनुपस्थिति से था, उसके नजरअंदाज़ करने से था, उसकी भावनात्मक निस्तब्धता से था।
उस दिन उसने कहा —
“बहुत कमजोर हो गया…”
लड़की ने पूछा —
“कौन? तुम?”
वह बोला —
“नहीं… रिश्ता। शायद लगभग टूट गया।”
“लगभग?”
उसके भीतर जैसे कुछ ठहर गया।
वह सोचने लगी —
जो कभी जोड़ा ही नहीं गया, जिसे कभी बराबरी से सींचा ही नहीं गया, उसके टूटने का दावा किस अधिकार से?
उसी दिन उसने ठान लिया — अब और नहीं।
चाहे उसके बिना जीवन कठिन हो,
पर उसका प्रेम इस उपेक्षा के योग्य नहीं था।
इतना समर्पण अगर ईश्वर को अर्पित किया जाए, तो वह भी प्रकट हो जाए —
फिर मनुष्य के लिए ऐसा समर्पण क्यों जो उसे मूल्यहीन समझे?
उसने पहली बार स्वयं से पूछा —
क्या किसी पर न्योछावर हो जाना गलत है?
नहीं।
पर उस पर न्योछावर हो जाना जो तुम्हारे जीवन का मूल्य न समझे — क्या यह स्वयं के प्रति न्याय है?
उत्तर स्पष्ट था।
और इस बार उसका निर्णय क्रोध से नहीं, स्वाभिमान से जन्मा था।
वापस जाना मतलब उसी चक्र में लौटना था।
इस बार उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

हर दिन एक साथ थोड़े ही होगा

 हर दिन एक सा
थोड़े ही होगा

कभी हंसी भी होगी
कभी उदासी भी होगी
निराशा की घनघोर
बदली में
आशा की कहीं
रौशनी भी होगी
कभी लड़खड़ाते
कदम भी होंगे
कभी डबडबाती
आंखे भी होंगी
आंसुओं से भीगी
पलकों के पीछे
कहीं मुस्कुराते
सपने भी होंगे।
ज़िंदगी के डगमगाते
रास्तों में,
भावनाओं का  उतार
चढ़ाव भी होगा
थक जाओ अगर
दुनियावी झंझटो से
सुस्ताने को कहीं
पड़ाव भी होगा

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

मत कहो मुझसे

अगर मैं दुःख में हूं,
तो मुझे दुःखी ही रहने दो।

अगर मैं रोना चाहती हूं,
तो मुझको जी भरकर
रोने दो।

मुझसे मत कहो
कि मैं मुस्कुराऊं,
आंसुओं को होंठों के
नीचे दबा कर।

मत थोपो मुझपर
ये सांसारिक
निर्दय औपचारिकताएं,
जिनको निभाने के लिए
मैं अपना वजूद खो दूं।

मत कहो मुझसे कि
मैं घोर निराशा के अंधकार में
आशा का दीपक जला दूं—
जो हैं ही नहीं, उससे
संसार को प्रत्यक्ष करा दूं।

बस इतनी-सी स्वतंत्रता दे दो मुझे
कि मैं, मैं बन कर जी लूं।

मत कहो मुझसे कि मैं
अपने मनोभावों को दबा दूं,
अपने चेहरे पर
छद्म भावों की
परत चढ़ा दूं।

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

जागृत

सोच ले और कर विचार,
इस तरह ना पथ निहार।

हैं मार्ग चिन्ह अपार,
न पा सकेगा इनका पार।

उतर मन से दुःख का भार,
न हो अब बीमार।

काम पड़े हैं यहाँ हज़ार,
बना तू फिर नये औज़ार।

कर फिर शुरू नया व्यापार,
सजा ले तू अपना संसार।

रंगींन कर दे मन का द्वार,
कर जीवन सागर में विहार।

मिटा दे अपना अहंकार,
तोड़ गुलामी का कारागार।

सोच ले और कर विचार।

पर्यावरण प्रदूषण

आज धरती पर अभिशाप मण्डरा गया है,
कहीं पर धूल, कहीं कूड़ा बिखरा है।

वातावरण धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है,
सुन्दर सी धरती अब अस्तित्व मिट रहा है।

मानव ही प्रकृति का शत्रु बन चुका है,
हरी-भरी बगिया का नाश कर रहा है।

खुद ही अपने विनाश का कारण बन रहा है,
नहीं जानता, खुद को संकट में डाल रहा है।

एक बार मानव ने शोध कर चुका है,
पेड़-पौधों बिना जीवन नहीं जान चुका है।

फिर भी स्वार्थ से अंधा, सिर्फ कुहरिल चला रहा है,
सुन्दर से अपने जग को, असुन्दर बना रहा है।

बेरहमी से पेड़-पौधों को काट रहा है,
अपने ही नुक़सान से अनजान बन रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहा है,
प्रकृति माँ को कुपित बना कर, खुद को महान समझ रहा है।



चुनाव



चुनाव क्या है? क्या जानते हो तुम?
या नेताओं के बीच खेला गया खेल,
इसे मानते हो तुम।

पर इस चुनाव में राजनीति का नाम नहीं,
और किसी अन्य की इच्छाओं, दुराग्रहों, व्यवहारों का भी कोई स्थान नहीं।

यह वह चुनाव नहीं, जिसमें मनो का राग हो,
यह तो स्वयँ ही, मन का दास है।

आलोचना से परे, यह हृदय का उल्लास है।

जब सामर्थ्य को दे, इसका अधिकार,
बस चुनाव का भाव, है अनुरागा एहसास।

जो हृदय से निकल जाता है आहसास,
प्रारम्भ में अपने चुनाव पर, पछताते हैं कुछ।

ये भी हो सकता है,
ये कर दे तुम्हे मालूम।

परिवर्तन

कल का मानव कहाँ था रहता,
कितने प्रकार के कष्ट सहता।

फिर भी अपना पालन-पोषण करता,
तन पर कपड़े बिना वो रहता।

जंतु पेड़ों की खाल पहनता,
जी-तोड़ परिश्रम करता।

नये औज़ार औज़ार बनाता,
नयी तरकीबे लड़ाता।

कंद-मूल फल तोड़कर लाता,
खुद खाता, सबको खिलाता।

विज्ञान का वह नहीं जानता,
खुद ही वो अनुमान लगाता।

तरह-तरह के प्रयास करता,
जिसका परिणाम हमें आज है दिखता।

आज प्रखर विज्ञान विधाता,
नये रंगों का संगम लगाता।

ये सुखद चमत्कार है कैसा,
उन आँखों पर विश्वास नहीं होता।

स्त्री एक शक्ति

स्त्री हूं👧

स्री हूं, पाबंदियों की बली चढ़ी हूं, मर्यादा में बंधी हूं, इसलिए चुप हूं, लाखों राज दिल में दबाए, और छुपाएं बैठी हूं, म...

नई सोच