शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

जागृत

सोच ले और कर विचार,
इस तरह ना पथ निहार।

हैं मार्ग चिन्ह अपार,
न पा सकेगा इनका पार।

उतर मन से दुःख का भार,
न हो अब बीमार।

काम पड़े हैं यहाँ हज़ार,
बना तू फिर नये औज़ार।

कर फिर शुरू नया व्यापार,
सजा ले तू अपना संसार।

रंगींन कर दे मन का द्वार,
कर जीवन सागर में विहार।

मिटा दे अपना अहंकार,
तोड़ गुलामी का कारागार।

सोच ले और कर विचार।

पर्यावरण प्रदूषण

आज धरती पर अभिशाप मण्डरा गया है,
कहीं पर धूल, कहीं कूड़ा बिखरा है।

वातावरण धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है,
सुन्दर सी धरती अब अस्तित्व मिट रहा है।

मानव ही प्रकृति का शत्रु बन चुका है,
हरी-भरी बगिया का नाश कर रहा है।

खुद ही अपने विनाश का कारण बन रहा है,
नहीं जानता, खुद को संकट में डाल रहा है।

एक बार मानव ने शोध कर चुका है,
पेड़-पौधों बिना जीवन नहीं जान चुका है।

फिर भी स्वार्थ से अंधा, सिर्फ कुहरिल चला रहा है,
सुन्दर से अपने जग को, असुन्दर बना रहा है।

बेरहमी से पेड़-पौधों को काट रहा है,
अपने ही नुक़सान से अनजान बन रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहा है,
प्रकृति माँ को कुपित बना कर, खुद को महान समझ रहा है।



चुनाव



चुनाव क्या है? क्या जानते हो तुम?
या नेताओं के बीच खेला गया खेल,
इसे मानते हो तुम।

पर इस चुनाव में राजनीति का नाम नहीं,
और किसी अन्य की इच्छाओं, दुराग्रहों, व्यवहारों का भी कोई स्थान नहीं।

यह वह चुनाव नहीं, जिसमें मनो का राग हो,
यह तो स्वयँ ही, मन का दास है।

आलोचना से परे, यह हृदय का उल्लास है।

जब सामर्थ्य को दे, इसका अधिकार,
बस चुनाव का भाव, है अनुरागा एहसास।

जो हृदय से निकल जाता है आहसास,
प्रारम्भ में अपने चुनाव पर, पछताते हैं कुछ।

ये भी हो सकता है,
ये कर दे तुम्हे मालूम।

परिवर्तन

कल का मानव कहाँ था रहता,
कितने प्रकार के कष्ट सहता।

फिर भी अपना पालन-पोषण करता,
तन पर कपड़े बिना वो रहता।

जंतु पेड़ों की खाल पहनता,
जी-तोड़ परिश्रम करता।

नये औज़ार औज़ार बनाता,
नयी तरकीबे लड़ाता।

कंद-मूल फल तोड़कर लाता,
खुद खाता, सबको खिलाता।

विज्ञान का वह नहीं जानता,
खुद ही वो अनुमान लगाता।

तरह-तरह के प्रयास करता,
जिसका परिणाम हमें आज है दिखता।

आज प्रखर विज्ञान विधाता,
नये रंगों का संगम लगाता।

ये सुखद चमत्कार है कैसा,
उन आँखों पर विश्वास नहीं होता।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

🌸 चश्मदीद... 🌸


जब तुमने
उपस्थिति और अनुपस्थिति
को एक ही परिभाषा में दर्ज़ करा दिया...

तो अब...
फ़र्क ही क्या पड़ता है...
कि तुम...
उपस्थित हो या अनुपस्थित...

होते हुए भी — तुम नहीं हो,
नहीं होते हुए भी — नहीं ही हो...
तो फिर...
फ़र्क ही क्या पड़ता है,
कि तुम कहाँ हो?

तुम जीवन को
प्रयोगशाला बना दो,
अपने प्रयोगों की
प्रदर्शनी लगा दो...

फ़िर... फ़र्क ही क्या पड़ता है,
कि तुम भावनाओं को धुआँ
बना कर उड़ा दो...

आज की दबी हँसी को
कल की खुशी बता दो,
वर्तमान की नींव ढहा कर
भविष्य का भवन बना दो...

फ़िर फ़र्क ही क्या पड़ता है,
तुम शब्दों का.. कैसा भी..
चक्रव्यूह बना दो।

✍️ — मनुप्रियश्री

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

ऊबने वाले लोग,कहीं भी ऊब जाते हैं।

✍️ रचना – मनुप्रियश्री (ममता पाठक)

ऊबना ही जिनका स्वभाव हो,
वो कहीं भी ऊब जाते हैं।
भरी महफ़िल की
चहल-पहल से ऊब जाते हैं,
हसीन वादियों की
खूबसूरती से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।

चलते-चलते अपनी ही
चाल से ऊब जाते हैं,
जीते-जीते जीने के
अंदाज़ से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।

संबंधों में सामंजस्य हो,
उस एकरसता से ऊब जाते हैं।
रिश्तों में खट्टास हो,
उस खिंचाव से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।

घर में रहकर
घर की दीवारों से ऊब जाते हैं,
बाहर रहकर
बाज़ारों से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।

ऊबने वालो! तब क्या करोगे,
जब हर बात से ऊब जाओगे?
भागोगे कहाँ तक उस ऊब से,
जो बाहर नहीं — तुम्हारे भीतर है।
जहाँ भी जाओगे,
वही ऊब फिर से पाओगे।

तुम्हें बाहर कुछ नहीं बदलना है,
ऊब का हल अपने भीतर खोजना है।
हटाओ वो परतें,
जिनके नीचे ऊब का बिछौना है।
तभी जीवन रंग लाएगा,
तभी मन स्थिर हो पाएगा।


स्त्री एक शक्ति

स्त्री हूं👧

स्री हूं, पाबंदियों की बली चढ़ी हूं, मर्यादा में बंधी हूं, इसलिए चुप हूं, लाखों राज दिल में दबाए, और छुपाएं बैठी हूं, म...

नई सोच