शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

जागृत

सोच ले और कर विचार,
इस तरह ना पथ निहार।

हैं मार्ग चिन्ह अपार,
न पा सकेगा इनका पार।

उतर मन से दुःख का भार,
न हो अब बीमार।

काम पड़े हैं यहाँ हज़ार,
बना तू फिर नये औज़ार।

कर फिर शुरू नया व्यापार,
सजा ले तू अपना संसार।

रंगींन कर दे मन का द्वार,
कर जीवन सागर में विहार।

मिटा दे अपना अहंकार,
तोड़ गुलामी का कारागार।

सोच ले और कर विचार।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

स्त्री एक शक्ति

स्त्री हूं👧

स्री हूं, पाबंदियों की बली चढ़ी हूं, मर्यादा में बंधी हूं, इसलिए चुप हूं, लाखों राज दिल में दबाए, और छुपाएं बैठी हूं, म...

नई सोच