गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

कुछ रिश्ते टूटे नहीं... खामोश हो जाते हैं..

मई की चिलचिलाती दोपहर।
सन्नाटे से भरा कमरा।
खिड़की से आती गर्म हवा सायं-सायं करती भीतर उतर रही थी।
कोने में लगे डबल बेड पर बिछी सफेद चादर पर रखी किताब के पन्ने हवा के झोंकों से अनमने ढंग से पलट जाते।
कमरे में हलचल थी, पर वातावरण में एक गहरी खामोशी पसरी हुई थी।
उसी खामोशी के बीच, खिड़की के पास वह लड़की खड़ी थी।
हाथ में मोबाइल।
उंगलियाँ तेज़ी से स्क्रीन पर फिसलतीं, फिर ठहर जातीं।
वह व्हाट्सऐप खोलती।
एक नाम खोजती।
डीपी पर टिक जाती।
कुछ क्षण।
एकटक।
फिर वापस। होम स्क्रीन।
और कुछ ही देर बाद — वही क्रम दोबारा।
उस तस्वीर में कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ प्रकृति की एक साधारण-सी छवि।
फिर भी वह जैसे उस तस्वीर में कोई उत्तर तलाश रही थी।
वह गहरी साँस लेकर खिड़की से दूर देखने लगी।
उसकी स्थिर आँखों में न जाने कितने दृश्य एक साथ तैर उठे।
वह मुस्कुराता चेहरा।
अपेक्षा से कहीं अधिक देखभाल करने वाला व्यवहार।
दिन-ब-दिन मज़बूत होता वह रिश्ता…
आज वही रिश्ता किस कगार पर आ खड़ा हुआ है।
कुछ स्मृतियों पर उसके होंठ हल्के-से मुस्कुरा उठते हैं,
और कुछ पर वह अनायास ही अपने आँसू पोंछ लेती है।
उसे वह पहली बातचीत याद आती है —
जो शाम से शुरू होकर अगले दिन की सुबह तक चली थी।
शायद वह ख़त्म भी न होती, अगर दिन की रोशनी ने उनके शब्दों के बीच प्रवेश न किया होता।
अब उसे हर शाम का बेसब्री से इंतज़ार रहने लगा था।
दिन चाहे जितना भी व्यस्त बीते,
शाम होते ही उसका मन एक ही नाम पर ठहर जाता।
दो हृदयों के बीच बोया गया भावनाओं का बीज धीरे-धीरे अंकुरित हो रहा था।
कुछ ही दिनों में वह एक नन्हा-सा पौधा बनकर विश्वास की धूप में लहराने लगा।
पर हर चमक की अपनी उम्र होती है।
वह चिंगारी जो शुरू में दोनों को रोशन करती थी, धीरे-धीरे एक ओर मंद पड़ने लगती,
और दूसरी ओर और अधिक भड़क उठती।
वह अनजाने में अपने समूचे संसार को एक ही व्यक्ति के चारों ओर बुनने लगी थी।
दुनियावी रिश्ते पीछे छूटते गए।
उसकी हँसी, उसकी प्रतीक्षा, उसकी दिनचर्या —
सब उसी से जुड़ गई।
पर शायद प्रेम का भार हर कोई एक-सा नहीं उठा पाता।
उसका बढ़ता समर्पण, जो उसके लिए जीवन था,
शायद उसके लिए एक अनकहा दबाव बनने लगा।
और यहीं से संतुलन डगमगाने लगा।
उफ़… प्रेम की यही तो विडंबना है।
जब तन्मयता दोनों ओर से बहती है, तो वह स्वर्ग-सी शांति देती है।
पर यदि वह एक ही दिशा में सिमट जाए,
तो वही प्रेम धीरे-धीरे एक आदत बन जाता है —
ऐसी आदत, जिसके छूटने पर भीतर बेचैनी जन्म लेती है।
वह बार-बार स्वयं को समझाती है,
पर मन किसी पुनर्वास की नहीं सुनता।
वह उसी नाम, उसी स्मृति, उसी प्रतीक्षा की ओर लौट जाता है।
तेरह घंटे की वह पहली बातचीत धीरे-धीरे तेरह मिनट में सिमट आई।
फिर कुछ सेकंड।
और एक दिन — पूर्ण शून्य।
समय तो वही था, पर प्राथमिकताएँ बदल गई थीं।
जब वह मुक्त था और वह व्यस्त,
उसने अपने समय को मोड़कर उसकी दुनिया में जगह बना ली थी।
पर जब वह स्वयं हल्की हुई, वह बोझिल होने लगा।
शायद सचमुच व्यस्त था।
शायद नहीं।
पर प्रेम, जो कभी दोनों का उत्सव था, अब उसके लिए एक अतिरिक्त कार्य-सा हो गया था।
समय के साथ उसकी महत्वाकांक्षाएँ फैलती गईं, और उनके साथ उसकी व्यस्तताएँ भी।
लड़की, जिसने अपने छोटे-छोटे संसार को सिमटाकर केवल उसी तक सीमित कर लिया था,
हर बढ़ते अंतर को भीतर से महसूस करती।
वह शिकायत करती —
न इसलिए कि उसे समय चाहिए था,
बल्कि इसलिए कि उसे उपस्थिति चाहिए थी।
वह सुनता, फिर लगभग हर बार वही उत्तर देता —
“तू खाली है, इसलिए ज़्यादा सोचती है।
कुछ काम ढूँढ़ ले।
तुझे इतनी ज़रूरत नहीं पड़ेगी बात करने की।
मैं फ्री नहीं बैठा हूँ।
जो कर रहा हूँ… हमारे भविष्य के लिए कर रहा हूँ।”
उसके शब्दों में तर्क था।
पर उसके स्वर में वह गर्माहट नहीं रही, जिससे कभी रातें सुबह में बदल जाती थीं।
जिसने अपना सब कुछ उसी के चरणों में रख दिया हो, उसके लिए ये शब्द असहनीय थे।
वह हैरान थी —
कभी उससे बात करने से पहले उसे अपना बनाने की कितनी तड़प हुआ करती थी।
एक दिन बिना देखे उसका हाल कैसा हो जाता था।
पहले साल में तो उसने एक भी दिन यूँ ही बिना बात किए जाने नहीं दिया था।
और आज… समय जैसे करवट बदल चुका था।
वह सोचती —
कब मैं उसकी प्राथमिकता से उसकी सूची के सबसे नीचे खिसक गई?
उसकी महत्वाकांक्षाएँ ऊँची होती गईं, और वह स्वयं छोटी पड़ती गई।
उसे लगता, अगर वह एक दिन चुप रह जाए, या उसकी दुनिया से अनुपस्थित हो जाए, तो शायद बहुत अंतर भी न पड़े।
और हर बार बात भविष्य पर टाल दी जाती —
उस भविष्य पर, जो अभी तक आया ही नहीं था।
पर अब चीज़ें दिन-ब-दिन विकृत होती जा रही थीं।
वह व्यस्त था —
उसे पैसा कमाना था।
इतना पैसा कि भविष्य सुरक्षित हो, सपने पूरे हों, दुनिया घूमी जाए।
पर उस भविष्य की दौड़ में आज का क्षण कहीं छूट गया था।
एक हृदय, जो उसके व्यवहार से रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूट रहा था,
उसकी चिंता अब उसके पास समय की सूची में नहीं थी।
जब कोई अपना सर्वस्व समर्पित कर दे और बदले में उदासीनता पाए, तो नाराज़गी स्वाभाविक है।
वह नाराज़ होती।
नाराज़गी झगड़ों में बदलने लगी।
धीरे-धीरे वह समय भी आ गया जब फ़ोन बात करने के लिए नहीं, झगड़ने के लिए उठाया जाता।
लड़की की अपेक्षाएँ और लड़के की उपेक्षा —
दोनों मिलकर रिश्ते को भीतर से खोखला करने लगीं।
कहाँ वे रातें, जहाँ शब्दों में प्रेम बहता था,
और कहाँ यह समय — जहाँ संवाद आरोपों में बदल गया।
एक दिन उसने कह दिया —
“तूने मेरे जीवन में ज़हर घोल दिया है।
अगर पता होता कि आगे चलकर तू ऐसी हो जाएगी,
तो मैं कभी तुझसे बात ही न करता।”
ये शब्द सुनकर उसका दिल जैसे भीतर ही भीतर बैठ गया।
वह देर तक सोचती रही —
आख़िर उसने माँगा ही क्या था?
समय? उपस्थिति? या बस वही अपनापन, जो कभी सहज मिला करता था?
एक दशक बीत गया।
उसे बार-बार लगता — शायद गलती उसी की है।
शायद वह ज़्यादा चाहती है।
शायद अपेक्षाएँ ही समस्या हैं।
उसने स्वयं को बदलने की कोशिश की।
अपनी अपेक्षाएँ घटाईं।
बात करने की आवृत्ति कम स्वीकार की।
लंबे कॉल्स की जगह संदेशों में ही जुड़े रहने को पर्याप्त मान लिया।
पर परिणाम वही रहा।
क्योंकि संदेश, संदेश ही होते हैं।
वे लिखने वाले के भावों की ऊष्मा पूरी तरह नहीं पहुँचा पाते।
धीरे-धीरे उसे उसके लंबे संदेश भी खलने लगे।
एक दिन उसने स्पष्ट कह दिया —
“लंबे मैसेज मत किया करो।
मैं पढ़ नहीं पाता।
कुछ कहना हो तो फ़ोन कर लिया करो।
मैसेज पढ़ने में मेरा सिर दर्द करने लगता है।”
उसने स्क्रीन पर टकटकी बाँधे काफ़ी देर तक वह वाक्य पढ़ा था।
कभी वही शब्द, जो रातों को सुबह में बदल देते थे, अब बोझ लगने लगे थे।
रिश्ता टूटा नहीं था।
बस अपाहिज़-सा घिसटता हुआ चल रहा था।
बात तो उससे करनी ही थी।
कई बार वह गुस्सा होती, उसकी खरी-खोटी सुनती,
फिर खुद ही माफ़ी माँग लेती —
“मेरी अपेक्षाएँ ज़्यादा हैं…
तुम्हारे बिना रह भी तो नहीं सकती।”
साल दर साल गुज़रते गए।
उसके व्यवहार में बदलाव और स्पष्ट होता गया।
कभी दोनों बातें साझा करते थे — अब केवल वही बोलती थी।
यह एकतरफ़ा वार्तालाप था।
सामने से “हूँ… हाँ…” बस इतना ही उत्तर मिलता।
धीरे-धीरे यही पैटर्न बन गया।
वह फोन करती, बात ख़त्म होने के बाद खुद को अजीब-सी बेइज़्ज़ती में डूबा पाती।
कुछ दिन चुप रह जाती।
सोचती — अब नहीं।
लेकिन उसके एक संदेश पर उसकी पटर-पटर फिर शुरू हो जाती।
जैसे भीतर संचित शब्द बस उसी एक संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों।
और फिर वही जवाब — “हूँ… हाँ…”
फोन कटने के बाद उसे एक असीमित पीड़ा का अनुभव होता।
जैसे उसने फिर अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया हो सिर्फ़ कुछ क्षणों की उपस्थिति के बदले।
उसे उसकी शिकायतों से चिढ़ थी।
उसकी अपेक्षाएँ उसे बोझ लगती थीं।
उसके आँसू उसे असहज कर देते थे।
वह किसी भी तरह की “नकारात्मक” बात सुनना नहीं चाहता था।
उसे बस हल्की, सहज, बिना प्रश्न वाली उपस्थिति चाहिए थी।
उसके भविष्य की अपनी योजनाएँ थीं — शायद पहली मुलाक़ात से ही।
वह जीवन को चरणों में बाँटकर देखता था —
अभी महत्वाकांक्षा, फिर स्थिरता, फिर शायद संबंध।
उसके लिए यह रिश्ता “जब तक चल सके” वैसा ही था।
पर लड़की के लिए — वह रिश्ता ही जीवन था।
वह उसमें पूर्णतः समर्पित थी।
उसने अपने वर्तमान, अपने सपने, अपनी प्राथमिकताएँ सब उसी एक धुरी पर टिका दी थीं।
वह साथ निभा रहा था।
वह साथ जी रही थी।
दोनों के निभाने में अंतर था,
एक के लिए रिश्ता विकल्प था, दूसरे के लिए अस्तित्व।
और यहीं से असंतुलन जन्मा।
बातें फिर भी होती रहीं — रोज़ नहीं, कभी-कभार।
अब वे संवाद नहीं रहे थे, एक औपचारिकता-से थे।
लड़की को अब एक बात साफ समझ आने लगी थी —
वह उसे जाने के लिए नहीं कह रहा था,
पर हर बार ऐसी परिस्थितियाँ बना देता कि वह स्वयं घुटकर पीछे हट जाए।
और होता भी यही था।
वह फ़ोन करती, सामने से “हूँ… हाँ…” बस इतना ही मिलता।
बातों में अपनापन समाप्त हो चुका था।
एक-दो दिन बात होती, फिर लंबा विराम।
कई बार तो महीने बीत जाते बिना किसी संवाद के।
उसका “हॉट एंड कोल्ड” व्यवहार उसे भीतर तक तोड़ देता।
एक पल सपने, दूसरे पल पूर्ण उदासीनता।
वह जानती थी — उस एक पल की खुशी के लिए वापस उसी पैटर्न में जाना खुद को फिर चक्की में पीस देना है।
फिर भी वह गई।
एक बार नहीं, कई बार।
पूरा एक वर्ष ऐसे ही बीता — महीनों की चुप्पी, फिर अचानक संवाद, फिर वही दूरी।
एक दिन उसका धैर्य टूट गया।
वह बहुत रोई।
बहुत कुछ कह दिया।
असल झगड़ा किसी शब्द का नहीं था —
झगड़ा उसकी अनुपस्थिति से था, उसके नजरअंदाज़ करने से था, उसकी भावनात्मक निस्तब्धता से था।
उस दिन उसने कहा —
“बहुत कमजोर हो गया…”
लड़की ने पूछा —
“कौन? तुम?”
वह बोला —
“नहीं… रिश्ता। शायद लगभग टूट गया।”
“लगभग?”
उसके भीतर जैसे कुछ ठहर गया।
वह सोचने लगी —
जो कभी जोड़ा ही नहीं गया, जिसे कभी बराबरी से सींचा ही नहीं गया, उसके टूटने का दावा किस अधिकार से?
उसी दिन उसने ठान लिया — अब और नहीं।
चाहे उसके बिना जीवन कठिन हो,
पर उसका प्रेम इस उपेक्षा के योग्य नहीं था।
इतना समर्पण अगर ईश्वर को अर्पित किया जाए, तो वह भी प्रकट हो जाए —
फिर मनुष्य के लिए ऐसा समर्पण क्यों जो उसे मूल्यहीन समझे?
उसने पहली बार स्वयं से पूछा —
क्या किसी पर न्योछावर हो जाना गलत है?
नहीं।
पर उस पर न्योछावर हो जाना जो तुम्हारे जीवन का मूल्य न समझे — क्या यह स्वयं के प्रति न्याय है?
उत्तर स्पष्ट था।
और इस बार उसका निर्णय क्रोध से नहीं, स्वाभिमान से जन्मा था।
वापस जाना मतलब उसी चक्र में लौटना था।
इस बार उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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