आज धरती पर अभिशाप मण्डरा गया है,
कहीं पर धूल, कहीं कूड़ा बिखरा है।
वातावरण धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है,
सुन्दर सी धरती अब अस्तित्व मिट रहा है।
मानव ही प्रकृति का शत्रु बन चुका है,
हरी-भरी बगिया का नाश कर रहा है।
खुद ही अपने विनाश का कारण बन रहा है,
नहीं जानता, खुद को संकट में डाल रहा है।
एक बार मानव ने शोध कर चुका है,
पेड़-पौधों बिना जीवन नहीं जान चुका है।
फिर भी स्वार्थ से अंधा, सिर्फ कुहरिल चला रहा है,
सुन्दर से अपने जग को, असुन्दर बना रहा है।
बेरहमी से पेड़-पौधों को काट रहा है,
अपने ही नुक़सान से अनजान बन रहा है।
प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहा है,
प्रकृति माँ को कुपित बना कर, खुद को महान समझ रहा है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें