होली का त्योहार है।
बाहर शोर है।
ढोल की थाप है।
लोगों की हँसी है।
रंग हवा में उड़ रहे हैं — जैसे हर कोई आज अपने भीतर का उन्माद बाहर फेंक देना चाहता हो।
कोई किसी पर गुलाल मल रहा है।
कोई कीचड़ फेंक रहा है।
कोई सिर्फ पानी उछालकर भी खुश है।
त्योहारों में लोग सीमाएँ भूल जाते हैं।
और भीड़ में व्यक्ति अक्सर अपना चेहरा भी।
वह खिड़की के पास बैठी है।
बाहर देख रही है —
पर सच तो यह है कि वह बाहर नहीं देख रही।
उसकी आँखें भीड़ के पार कहीं और अटकी हुई हैं।
रंगों का यह शोर
उसके भीतर एक और शोर जगा देता है —
स्मृतियों का।
होली उसके लिए त्योहार नहीं है।
एक तारीख़ है।
एक ऐसा दरवाज़ा, जो हर साल खुल जाता है —
और वह फिर उसी जगह खड़ी मिलती है।
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धीरे-धीरे उसकी आँखों में गाँव उभरता है।
छोटा-सा घर।
कच्चा आँगन।
पीछे खेत।
दूर तक फैली हरियाली।
माँ।
पिता।
तीन बच्चे।
वह सबसे बड़ी।
दोनों भाई उसके पीछे-पीछे घूमते रहते।
घर में कमी नहीं थी।
अभाव नहीं था।
संतोष था।
खेत लहलहाते थे।
पेड़ों पर फल झूमते थे।
गौशाला में गायों की धीमी-धीमी घंटियाँ बजती थीं।
जीवन में साधन भले सीमित थे,
पर अपनापन प्रचुर था।
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फिर एक दिन —
सब कुछ बिना शोर किए बदल गया।
माँ खेत में काम कर रही थी।
किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वह आख़िरी दिन होगा।
हृदय की गति थमी —
और घर की धड़कन भी।
माँ के जाने की आवाज़ नहीं हुई।
पर उसके बाद घर की हर आवाज़ बदल गई।
रसोई वही थी।
दीवारें वही थीं।
पर भीतर से घर का तापमान ठंडा हो गया था।
बारह साल की बच्ची ने पहली बार समझा —
ज़िम्मेदारी उम्र देखकर नहीं आती।
उसने खेलना छोड़ा नहीं,
पर खेलना भूल गई।
उसने खाना बनाना सीखा।
भाइयों की कॉपियाँ सँभालीं।
पिता के चेहरे की थकान पढ़ना सीखा।
उस उम्र में जब बच्चियाँ गुड़ियों से घर बसाती हैं,
उसने सचमुच घर संभाला।
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गाँव छोटा था।
और छोटे गाँवों में नज़रें बड़ी होती हैं।
कुछ लड़के —
उम्र में थोड़े बड़े —
रास्तों पर खड़े रहते।
उनकी हँसी सामान्य नहीं होती थी।
उनकी निगाहें भी।
वह चुप रहती।
अनसुना करती।
तेज़ कदमों से निकल जाती।
वह जानती थी —
अगर पिता को बताया, तो शायद पढ़ाई रुक जाएगी।
और पढ़ाई ही उसका रास्ता थी।
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समय बीता।
उसने बारहवीं पास की।
पढ़ने की जिद रखी।
दूर कॉलेज का फॉर्म भरा।
जीवन कठिन था,
पर दिशा थी।
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फिर वह शाम आई।
सूरज ढल रहा था।
उसे याद आया —
गाय के लिए घास नहीं लाई।
पिता ने रोका भी —
“शाम हो गई है।”
पर ज़िम्मेदारी आदत बन चुकी थी।
वह दरांती लेकर निकल गई।
खेतों में सन्नाटा था।
सांझ धीरे-धीरे धरती पर उतर रही थी।
और उसे यह आभास भी नहीं था
कि कोई उसकी पीठ पर नज़र गड़ाए हुए है।
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अचानक वह सामने आ खड़ा हुआ।
वही।
जिसकी नज़रें अक्सर उसका पीछा करती थीं।
उसने उसका हाथ पकड़ लिया।
पकड़ में अधिकार नहीं,
ज़बरदस्ती थी।
हँसी में हल्कापन नहीं,
ज़िद थी।
उस पल उसे पहली बार समझ आया —
डर सिर्फ शरीर को नहीं जकड़ता,
आवाज़ को भी जकड़ लेता है।
उसका गला सूख गया।
“रास्ता छोड़ दो…”
वह हँसा।
उसकी पकड़ और कस गई।
उसे लगा —
अँधेरा सिर्फ चारों ओर नहीं, भीतर भी उतर रहा है।
फिर —
न जाने कहाँ से ताक़त आई।
उसने हाथ छुड़ाया।
और एक तेज़ थप्पड़।
उस आवाज़ में उसका डर नहीं,
उसकी मर्यादा थी।
वह तिलमिलाया।
और उसने भागना चुना।
दौड़ते हुए उसे लगा —
साँसें पीछे छूट रही हैं।
पीछे से आवाज़ आई —
“महँगा पड़ेगा!”
यह धमकी शब्द नहीं थी।
एक छाया थी, जो उसके साथ घर तक आई।
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घर पहुँचकर वह सच नहीं कह पाई।
क्योंकि सच बोलने से पहले ही
उसे परिणाम दिखने लगे थे।
उसने झूठ बोला।
उस रात उसने जाना —
डर बाहर से अधिक भीतर रहता है।
और धमकी समय के साथ पुरानी नहीं होती,
गहरी होती है।
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एक महीना बीता।
होली आई।
घर में तैयारी थी।
छोटा भाई बेहद खुश था।
उम्र कम थी।
विश्वास ज़्यादा।
कुछ लड़कों ने उसे अपने साथ मिला लिया।
मासूमियत को पहचानना आसान होता है।
होली की रात —
वह उनके साथ चला गया।
रात बीती।
सुबह हुई।
वह नहीं लौटा।
दोपहर तक बेचैनी डर बन चुकी थी।
फिर खबर आई।
खेत में कोई पड़ा है।
वे दौड़े।
बीच में वह था।
निश्चल।
उसका छोटा भाई।
गला काटा हुआ।
खून से भीगे कपड़े।
होली का रंग उस दिन अलग था।
लोग जानते थे शक किस पर है।
पर कोई बोला नहीं।
डर ने सच को बाँध रखा था।
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पिता की आँखें सूख चुकी थीं।
माँ के बाद
अब बेटा।
घर का आँगन फिर खाली हो गया।
और उसके भीतर एक सवाल हमेशा के लिए बैठ गया —
क्या उस थप्पड़ की गूँज यहाँ तक आई थी?
कभी-कभी उत्तर नहीं मिलते।
सिर्फ़ बोझ रह जाता है।
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पिता ने गाँव छोड़ दिया।
ज़मीन गई।
खेत गए।
पर बच्चों को बचाना ज़रूरी था।
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अब साल बीत चुके हैं।
वह शहर में है।
जीवन आगे बढ़ चुका है।
पर हर साल —
जब फाल्गुन की हवा चलती है,
जब कोई “होली है!” चिल्लाता है —
उसके भीतर वही खेत उग आते हैं।
वही सांझ।
वही थप्पड़।
वही धमकी।
वही खून।
कुछ रंग सचमुच वापस नहीं आते।
और इसलिए —
वह होली नहीं मनाती।
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