पहली भिक्षा
गाँव की वह छोटी-सी सरकारी प्राथमिक पाठशाला दोपहर की धूप में शांत पड़ी थी। मिट्टी के आँगन में हवा धूल के कणों को धीरे-धीरे उड़ा रही थी। भीतर एक कमरा था, जहाँ पंद्रह-बीस बच्चे अध्यापक की अनुपस्थिति में शोर कर रहे थे।
शोर धीरे-धीरे बहस में बदला।
बहस अपशब्दों में।
और अपशब्द हाथापाई में।
गुस्से में एक लड़के ने सामने रखी लकड़ी की अध्यापक की कुर्सी उठाई और दूसरे की ओर फेंक दी। कुर्सी किसी को लगी नहीं, पर ज़ोर से ज़मीन पर गिरी और उसकी एक टांग टूट गई।
उसी क्षण दरवाज़ा खुला।
अध्यापक भीतर आए। उनकी नज़र टूटी कुर्सी पर ठहरी। चेहरा सख्त हो गया।
“किसने तोड़ी ये?”
कमरे में सन्नाटा फैल गया। कुछ बच्चों ने सिर झुका लिया। कुछ ने एक-दूसरे को देखा। कोने में बैठा एक दुबला-सा, शांत लड़का — साधो — चुपचाप अपनी उंगलियाँ मरोड़ रहा था।
खुसर-फुसर हुई।
निर्णय हुआ।
नाम लिया गया — “साधो ने।”
अध्यापक बिना कुछ पूछे उसके पास पहुँचे।
“क्यों तोड़ी?”
“मास्टर साहब… मैंने नहीं—”
थप्पड़ की आवाज़ कमरे में गूँज गई।
“झूठ बोलता है?”
साधो की आँखों में आँसू भर आए। “मैंने नहीं तोड़ी…”
पर किसी ने उसकी आँखों में झाँकने की ज़रूरत नहीं समझी।
डंडा उठा। पीठ पर पड़ा।
एक बार।
दो बार।
अंत में आदेश सुनाया गया —
“तीन सौ रुपये भरेंगे तेरे बाप। नहीं तो कल से स्कूल मत आना।”
तीन सौ रुपये।
उस घर में जहाँ पिता पूजा-पाठ करके पाँच बच्चों का पालन करते थे, वह रकम किसी दंड से कम नहीं थी।
.......
मुड़ते हुए कदम
शाम को साधो घर की ओर चला। दूर से उसने घर के बाहर लोगों की भीड़ देखी। खबर उससे पहले पहुँच चुकी थी।
उसकी पीठ अभी भी जल रही थी। मन में अपमान और भय की लहरें उठ रही थीं।
वह रुका।
बस कुछ कदम और…
और वह घर पहुँच जाता।
पर उसने पीछे मुड़कर देखा
और फिर उल्टी दिशा में चल पड़ा।
ग्यारह साल का एक बच्चा
अपने घर, अपने नाम, अपने बचपन को पीछे छोड़कर
अज्ञात की ओर चल पड़ा।
.......
भूख और अकेलापन
दो दिन बाद वह एक अनजान शहर में था।
भूख से पेट ऐंठ रहा था। उसने ढाबे के बाहर खड़े होकर पूछा ..
“कुछ खाने को मिल जाएगा?”
किसी ने दया नहीं की।
उसने बर्तन धोने की पेशकश की। बदले में सूखी रोटी मिली।
रात को बंद दुकानों के सामने, जहाँ आवारा कुत्ते सोते थे, वहीं वह भी सिकुड़कर लेट गया।
दिन ऐसे ही बीतने लगे।
काम के बदले भोजन।
फुटपाथ पर नींद।
और भीतर गहरी चुप्पी।
....
एक साधु की दृष्टि
एक दिन एक साधु ने उसे देखा।
“घर से भागे हो?”
साधो ने कुछ नहीं कहा। उसकी चुप्पी ही उत्तर थी।
साधु उसे धर्मशाला ले गया।
पहली बार किसी ने उसे प्रश्नों से अधिक अपनापन दिया।
वर्ष बीतते गए।
साधु जहाँ जाता, साधो साथ जाता।
भिक्षा में जो मिलता, वही दोनों खाते।
धीरे-धीरे भीतर का आक्रोश तपकर धैर्य में बदल गया।
ग्यारह साल का बालक
इक्कीस वर्ष का युवा बन गया।
ग्यारह साल का बालक
इक्कीस वर्ष का युवा बन गया।
......
दीक्षा का क्षण
एक सुबह, जब सूरज की पहली किरणें मंदिर की सीढ़ियों को छू रही थीं, साधु ने साधो को अपने पास बुलाया।
“समय आ गया है,” उन्होंने शांत स्वर में कहा, “अब तुम्हें संसार से नहीं, अपने भीतर से जुड़ना है।”
नदी के किनारे एक छोटा-सा उपक्रम हुआ।
साधो ने स्नान किया — जैसे बीते वर्षों का हर दुःख, हर अपमान जल में बहा रहा हो।
फिर साधु ने उसके सिर पर हाथ रखा, उसके बाल उतारे गए —
हर गिरता हुआ बाल मानो उसके पुराने नाम, पुराने दर्द और उस मासूम बच्चे की यादों को विदा कर रहा था।
उसे गेरुए वस्त्र पहनाए गए।
माथे पर भस्म लगाई गई।
साधु ने उसके कान में मंत्र फूँका —
धीरे, गहरे, जैसे आत्मा को छूता हुआ कोई स्वर।
“आज से तुम केवल साधो नहीं… एक साधक हो,”
उन्होंने कहा, “अब तुम्हारा पहला कर्तव्य है — अपनी माँ से भिक्षा लेना। वही तुम्हारे इस नए जीवन की पहली सीढ़ी होगी।”
साधो की आँखें नम हो गईं।
सालों से दबा हुआ एक कोना फिर से धड़क उठा —
माँ…
उसने पहली बार महसूस किया,
संन्यास त्याग नहीं होता,
सबसे गहरे प्रेम की अग्नि से होकर गुजरना होता है।
और फिर…
कमंडल हाथ में लिए,
धीमे कदमों से
वह अपने गाँव की ओर चल पड़ा।
संन्यास से पहले नियम था —
माँ के चरण स्पर्श कर पहली भिक्षा लेना।
संन्यास से पहले नियम था —
माँ के चरण स्पर्श कर पहली भिक्षा लेना।
साधो अपने गाँव लौटा।
कोई उसे पहचान न सका।
पर वह घर की एक-एक बात जानता था।
लोग उसके ज्ञान से प्रभावित हुए। माँ-पिता भी भीड़ में खड़े सुन रहे थे।
जब भिक्षा का समय आया, उसने कहा —
“पहली भिक्षा माँ से चाहिए।”
माँ काँपते हाथों से अन्न लेकर आईं।
वह झुका।
माँ पीछे हट गईं ...
“आप संत हैं। मुझे पाप का भागी मत बनाइए।”
उसकी आवाज़ धीमी थी —
“क्या आप अपने पुत्र को भी आशीर्वाद नहीं देंगी?”
माँ का चेहरा बदल गया।
“पुत्र…?”
और फिर उसने सब कह दिया।
स्कूल।
डंडा।
मुड़ते हुए कदम।
माँ वहीं बैठ गईं। आँसू रुक नहीं रहे थे।
“तुझे कहाँ नहीं ढूँढा…”
घर रो रहा था — खोने के भी आँसू, पाने के भी।
“अब मत जाओ,” माँ ने कहा।
साधो शांत था।
“अब मैं लौट नहीं सकता। पर दूर भी नहीं जाऊँगा।”
अंततः निर्णय हुआ —
वह गाँव के मंदिर में मठ बनाकर रहेगा।
घर का होकर भी, घर से अलग।
कुछ समय बाद वही अध्यापक उसके पास आए। आँखों में पश्चाताप था।
साधो ने उन्हें देखा।
फिर धीरे से कहा —
“जिस दिन आपने मुझे दंड दिया,
उस दिन मैं टूट गया था।
पर उसी दिन से मैं खोज में निकल पड़ा।
आज मैं आपको दोष नहीं देता।”
अध्यापक रो पड़े।
मठ के आँगन में आज भी एक टूटी लकड़ी की कुर्सी रखी है —
स्मरण के लिए।
कि किसी बच्चे की आवाज़ को दबाने से पहले,
उसकी आँखों में झाँक लेना चाहिए।
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