शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

खून की होली

होली का त्योहार है। बाहर हुड़दंग मची हुई है। जिसका जो मन कर रहा है, जो हाथ में पड़ रहा है, वह दूसरे पर डाल दे रहा है—चाहे वह रंग हो, गुलाल हो, अबीर हो या कीचड़, या कुछ भी चीज, या खाली पानी ही क्यों न हो।
वह खिड़की में बैठी इस नज़ारे का बिल्कुल भी आनंद नहीं ले रही थी। बल्कि इस उन्माद को देखकर वह और अधिक दुखी हो रही थी। होली का त्योहार उसकी ज़िंदगी का सबसे मनहूस त्योहार था, क्योंकि होली हर बार उसे कुछ ऐसा याद दिला देती थी कि उसका दिल पीड़ा से कराह उठता था।
होली की इस हुड़दंग में खोई उसकी आँखों में अपने गाँव की वह सुंदर-सी तस्वीर धीरे-धीरे उभर आई—उनका छोटा-सा घर, खेत-खलिहान, माँ-बाप और तीन भाई-बहन, जिनमें वह सबसे बड़ी थी और दोनों भाई उससे छोटे।
हँसता-खेलता परिवार। कई बीघा ज़मीन। फसलों से लहलहाते खेत। कई तरह के फलों से लदे पेड़। गौशाला में दुधारू गाएँ। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी उस घर में।
तीनों बच्चे माँ-बाप का भरपूर प्यार पाते थे। तीनों में बड़ा मेल-मिलाप था। माँ-बाप भी बच्चों को देखकर संतुष्ट और प्रसन्न रहते थे। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था… जीवन जैसे अपनी सहज लय में बह रहा था।
लेकिन एक दिन उसकी माँ खेत में काम कर रही थी। न जाने उसकी हृदय गति कैसे रुक गई। बहुत कम उम्र में ही वह अपनी दुनिया को अलविदा कह गई।
उस दिन जैसे घर की दीवारें तो वही रहीं, पर घर का दिल धड़कना बंद हो गया।
माँ चली गई। घर सूना हो गया। माँ के बिना भला घर भी घर रह जाता है क्या?
तीनों बच्चे तब तक किशोरावस्था की दहलीज़ तक भी नहीं पहुँचे थे। उन पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था। पिता भीतर से टूट चुके थे। वे अक्सर उदास रहने लगे थे, पर तीन बच्चों का भरण-पोषण करना था, उनका ध्यान रखना था। सिर्फ दुख में डूबे रहकर जीवन नहीं चलता।
उन्होंने दूसरी शादी करने का विचार तक नहीं किया। उन्होंने बच्चों को अपने स्नेह और जिम्मेदारी से पाला।
छोटी-सी बेटी, जिसकी उम्र मात्र बारह वर्ष थी, उसने घर को संभाल लिया — एक माँ की तरह। चूल्हा-चौका, बर्तन, खाना बनाना… सब उसने सीख लिया। साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। वह दोनों छोटे भाइयों का भी भरपूर ख्याल रखती।
दिन इसी तरह बीतते गए। धीरे-धीरे माँ के चले जाने का घाव ऊपर से थोड़ा भरने लगा, पर भीतर की पीड़ा पूरी तरह कभी कम नहीं हुई। माँ की याद आज भी हर छोटे-बड़े अवसर पर चली आती थी।
घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी — जमीन, खेत-खलिहान, फलों से लदे पेड़, गौशाला में गायें — सब कुछ था। फिर भी एक कमी थी — सुविधाओं की। पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता था। रोजमर्रा का सामान भी कई किलोमीटर दूर से लाना पड़ता था। गाँव दूरस्थ था, जहाँ सुख-सुविधाएँ सीमित थीं।
पिता गाँव छोड़ना नहीं चाहते थे। पैतृक संपत्ति, जमीन-जायदाद, पीढ़ियों की मेहनत — उसे यूँ ही कैसे छोड़ देते? इसलिए उन्होंने वहीं रहकर सब संभालने का निश्चय किया।
बच्चे रोज कई किलोमीटर पैदल स्कूल जाते और उतनी ही दूरी तय करके वापस लौटते।
उसी गाँव में कुछ और लड़के थे, जो उम्र में उनसे थोड़े बड़े थे। वे भी साथ-साथ बड़े हो रहे थे, पर उनकी नीयत साफ़ नहीं थी। आते-जाते वे छोटी लड़कियों को छेड़ते, भद्दी बातें करते।
लड़की और उसके भाई अक्सर इन बातों को अनसुना कर देते। वह अपने पिता को यह सब बताना भी नहीं चाहती थी। वह जानती थी — अगर पिता को यह बात पता चली, तो शायद वे उसकी पढ़ाई छुड़वा देंगे।
और पढ़ाई के अलावा उसके पास आगे बढ़ने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
गाँव के एक बदमाश लड़के की नज़र कब से उस पर थी। बस उसे कभी वह अकेले नहीं मिली, इसलिए अब तक वह बची रही। कई दिनों से वह उसकी ताक में था।
समय यूँ ही बीतता गया। बचते-बचाते लड़की ने बारहवीं की पढ़ाई भी पूरी कर ली। दोनों भाई उससे दो-दो साल छोटे थे, उनकी पढ़ाई भी चल रही थी। वह किसी तरह अपना भी ध्यान रखती और दोनों भाइयों का भी ख्याल करती।
बारहवीं पास करने के बाद उसने ग्रेजुएशन करने का निश्चय किया। उसने दूसरे गाँव के डिग्री कॉलेज में प्राइवेट फॉर्म भर दिया। परीक्षा देने के लिए उसे काफी दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था।
घर का सारा काम वह करती ही थी। गौशाला में एक बहुत ही बढ़िया दुधारू गाय थी। उस गाय को रोज़ ताज़ी, हरी घास चाहिए होती थी। वह प्रतिदिन दिन में घास काटकर उसके लिए रख देती थी। बाकी भारी काम उसके पिता संभालते थे।
एक दिन ऐसा हुआ कि वह किसी काम में उलझ गई और गाय के लिए घास नहीं ला पाई। शाम ढलने लगी तो अचानक उसे याद आया —
“अरे… गाय के लिए घास तो लानी ही है।”
सूरज लगभग ढल चुका था। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। खेतों की तरफ़ सन्नाटा उतर रहा था…
और वह दरांती उठाकर बाहर निकल गई।
बाहर निकलते हुए पिता ने उसे आवाज़ दी और टोका —
“बेटी, इस समय कहाँ जा रही हो?”
उसने जल्दी से उत्तर दिया —
“पिताजी, गाय के लिए घास लाना आज भूल गई। बहुत ज़रूरी है घास लाना।”
पिता कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले —
“ज़रूरी तो है, बेटा… लेकिन यह समय घर से बाहर निकलने का नहीं है। अगर जाना ही है, तो जल्दी लौट आना। और अगर घास न मिले, तो कहीं इधर-उधर मत भटकना।”
उसने “हाँ” में सिर हिलाया। घास की टोकरी उठाई, दरांती हाथ में ली और तेज़ क़दमों से निकल पड़ी।
इधर-उधर देखा — पर कहीं ताज़ी घास नहीं दिखी। लोग दिन में ही काट ले गए थे, या गाय-भैंस चर चुकी थीं। खेत लगभग खाली थे।
लेकिन घास लाना ज़रूरी था।
वह आगे बढ़ती गई… तेज़ क़दमों से… फिर लगभग दौड़ती हुई।
उसे यह बिल्कुल पता नहीं था कि दो नज़रें उसके पीछे-पीछे चल रही थीं।
उसे इसका आभास भी नहीं हुआ, क्योंकि उसका सारा ध्यान सिर्फ़ घास ढूँढने में लगा था।
शाम अब और गहरा रही थी
वे आँखें धीरे-धीरे उसके और निकट आती गईं…
और अचानक वह उसके सामने आ खड़ा हुआ।
सब कुछ जैसे एक क्षण में थम गया।
उसने झटके से उसका हाथ पकड़ लिया।
हँसी में एक अजीब-सी अकड़ थी —
“डरने की क्या बात है? हम तो तुम्हारे पुराने चाहने वाले हैं… बस समझ लो, आज मुलाक़ात हो गई।”
वह सिहर उठी। उसकी पकड़ कड़ी होती जा रही थी।
“एक दिन नहीं… दो दिन नहीं… सालों से इस दिन का इंतज़ार किया है मैंने,” वह धीमे लेकिन दबाव भरे स्वर में बोला।
लड़की का गला सूख गया। वह काँपती आवाज़ में बस इतना कह पाई —
“मेरा रास्ता छोड़ दो…”
वह हँसा —
“इतने सालों की तपस्या के बाद पहली बार तो मिली हो… और मैं यूँ ही जाने दूँ?”
वह एक कदम और बढ़ा।
शाम का अँधेरा अब और गहरा चुका था।
उसके हाथों से टोकरी छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। दरांती भी दूर जाकर खनकती हुई गिरी।
डर से उसके पसीने छूट रहे थे। वह पीछे हटने लगी… पर पीछे अब सिर्फ खाली खेत और फैलता अँधेरा था।
उसने उसके दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए।
उसकी पकड़ में एक अजीब-सी ज़िद और हिंसक अधीरता थी।
लड़की पूरी ताक़त से छूटने की कोशिश करने लगी। उसने हाथ-पैर झटके, शरीर को मोड़ा, आवाज़ लगाई।
न जाने कहाँ से उसके भीतर अचानक साहस उमड़ आया। उसका एक हाथ उसकी पकड़ से छूट गया।
छूटते ही उसने पूरी ताक़त से उसके गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया।
इतना तेज़ कि वह पल भर को तिलमिला उठा।
उसी क्षण का फायदा उठाकर उसने दूसरा हाथ भी छुड़ा लिया।
वह बिना पीछे देखे दौड़ पड़ी।
दुपट्टा वहीं छूट गया। टोकरी और दरांती खेत में पड़ी रह गईं।
पीछे से उसकी कर्कश आवाज़ आई —
“इस थप्पड़ का जवाब तुझे बहुत महँगा पड़ेगा… याद रखना!”
पर वह रुकी नहीं।
उसके कानों में बस अपनी धड़कनों की आवाज़ गूँज रही थी।
वह हड़बड़ाती हुई घर पहुँची।
उसकी धड़कनें अब भी बेकाबू थीं। साँसें तेज़ चल रही थीं। आँखें नम थीं। और दुपट्टा… वह तो खेत में ही छूट गया था।
पिता आँगन में बेचैनी से उसका इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही वह भीतर आई, उसकी हालत देखकर घबरा उठे।
“अरे, क्या हुआ? तुम्हारे साथ क्या हुआ? ऐसे क्यों काँप रही हो? कुछ हुआ है क्या?”
वह कुछ क्षण तक चुप खड़ी रही। उसकी छाती उठ-गिर रही थी। शब्द गले में अटक रहे थे।
गाँव का माहौल ऐसा था जहाँ अंधेरे और परछाइयों को लोग अक्सर भूत-प्रेत से जोड़ देते थे। शाम ढलने के बाद अकेले बाहर जाना वैसे ही अच्छा नहीं माना जाता था।
उसने उसी डर का सहारा लिया।
धीरे से बोली —
“मैं… मैं घास काटने के लिए झुकी थी, तभी लगा जैसे कोई छाया पास आ रही हो… बहुत पास… मुझे लगा कोई है वहाँ… मैं डर गई पिताजी… और भाग आई।”
उसने नज़रें नीचे कर लीं।
पिता ने गहरी साँस ली।
“कितनी बार कहा है शाम ढलने के बाद मत जाया करो,” उन्होंने हल्की झुंझलाहट और चिंता के मिश्रण से कहा।
उन्होंने उसे अंदर जाने को कहा।
“ठीक है, आज रहने दो। सुबह देख लेंगे।”
वह चुपचाप भीतर चली गई।
पर कमरे में पहुँचते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह जानती थी —
वह झूठ बोल आई है।
पर सच बोलने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
सच से पिता की चिंता बढ़ जाती… और शायद उसकी दुनिया सिमट जाती।
उस रात उसने पहली बार महसूस किया —
डर सिर्फ बाहर नहीं होता,
डर भीतर भी घर बना लेता है।
लड़के की दी हुई धमकी उसके मन में घर कर चुकी थी।
उसे हर समय यही लगता — वह कुछ न कुछ अवश्य करेगा। वह ऐसा व्यक्ति नहीं था जो अपमान सहकर चुप बैठ जाए। गाँव में उसका नाम ही बदमाशी के लिए था। जब वह औरों को नहीं छोड़ता, तो उसे क्यों छोड़ देगा?
उसके भीतर एक स्थायी डर बैठ गया था।
अब हाल यह था कि जिस दिन पिता या भाई घर आने में थोड़ी-सी भी देर कर देते, उसका मन अनहोनी की आशंका से भर उठता। हर आहट पर वह चौंक जाती। हर परछाईं उसे किसी खतरे की तरह लगती।
इस घटना को लगभग एक महीना बीत चुका था।
और अब होली आ गई थी।
घर में होली की तैयारी चल रही थी।
गुजिया बन रही थीं। मिठाइयाँ तैयार की जा रही थीं। रंग और अबीर की छोटी-छोटी पोटलियाँ बाँधी जा रही थीं।
वह भी काम में लगी हुई थी। दोनों भाई थोड़ा-थोड़ा हाथ बँटा रहे थे। बड़ा भाई कुछ समझदार हो चला था, पर छोटा भाई अभी भी बहुत मासूम था — उम्र कोई सोलह-सत्रह वर्ष रही होगी।
इसी मासूमियत का फायदा उन बदमाश लड़कों ने उठाया।
उन्होंने उससे बातचीत शुरू की। हँसी-मज़ाक किया। कुछ ही दिनों में उसे अपना “दोस्त” बना लिया। वे उम्र में उससे बड़े थे, बातें भी ऐसी करते कि वह उन पर भरोसा कर बैठा।
होली का दिन आ गया।
उन्होंने उसे अलग से कहा —
“आज रात पार्टी करेंगे। तू भी आना… घर में किसी को मत बताना। असली मज़ा तो रात की होली में है।”
गाँव में प्रायः रात को भी होली का आयोजन होता था। लोग फाग गाते, ढोलक बजती, कई जगह दावतें होतीं। कुछ लोग नशा भी करते। गीत, नाच, शोर — सब कुछ मिलकर एक अलग ही माहौल बना देता।
छोटा भाई उनकी बातों में आ गया।
उसे लगा, दोस्तों के साथ होली मनाने में क्या बुराई है।
रात को वह घर से यह कहकर निकला कि वह दोस्तों के साथ होली खेलने जा रहा है…
और उन लोगों के साथ दावत में चला गया।
उस रात किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चला कि दावत में उसके साथ क्या हुआ।
होली का दिन था। रात तक बाहर रहना असामान्य नहीं माना जाता था।
पर जब आधी रात बीत गई और वह घर नहीं लौटा, तो पिता की बेचैनी बढ़ने लगी। बड़ा भाई भी चिंतित हो उठा।
“कहाँ चला गया होगा?”
वे पड़ोसियों के घर गए। आसपास पूछताछ की।
किसी को कुछ मालूम नहीं था।
आख़िर उन्होंने सोचा —
शायद दोस्तों के साथ कहीं सो गया हो, सुबह आ जाएगा।
सुबह हुई।
दोपहर होने लगी।
पर वह नहीं आया।
पिता और बड़ा भाई उसके उन तथाकथित “दोस्तों” के घर गए।
उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया —
“वह हमारे साथ नहीं था।”
अब चिंता डर में बदल चुकी थी।
तीनों घर के आँगन में बैठे थे — भारी मन, सूनी आँखें, अनकहे भय के साथ।
तभी गाँव का ही एक आदमी हाँफता हुआ आया। उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ झलक रही थी।
वह कुछ क्षण शब्द ही नहीं जुटा पाया।
फिर टूटती आवाज़ में बोला —
“खेत की तरफ… करन सिंह के खेत में… कोई पड़ा है… लगता है… आपका बेटा…”
इतना सुनना था कि जैसे ज़मीन खिसक गई।
पिता, बड़ा भाई और वह — तीनों बदहवासी में उधर दौड़े।
खेत में भीड़ जमा थी।
बीच में उसका छोटा भाई निश्चल पड़ा था।
उसका गला किसी ने निर्ममता से काट दिया था।
कपड़े खून से भीगे हुए थे।
होली का रंग…
उस दिन किसी और रंग में बदल चुका था।
गाँव के लगभग हर व्यक्ति को भीतर-ही-भीतर अंदाज़ा था कि यह किसका काम हो सकता है।
पर कोई इतना साहसी नहीं था कि खुलकर नाम ले सके।
न कोई गवाही देने को तैयार था,
न कोई सच कहने को।
सबको अपनी-अपनी ज़िंदगी प्यारी थी।
वह बीहड़-सा गाँव था —
जहाँ पुलिस सिर्फ नाम भर की थी,
जहाँ कानून कागज़ों में था,
और असली कानून कुछ दबंग लोगों की मुट्ठी में।
उनकी दहशत के नीचे ही लोग जीते थे।
उसी भय के साए में बच्चे बड़े होते थे।
सबने दुख जताया।
सबने अफ़सोस किया।
होली की खुशियाँ अचानक शोक में बदल गईं।
पर कोई भी उस जड़ तक नहीं पहुँचा
जिसने यह सब किया था —
जबकि हर मन जानता था कि शक किस पर है।
लड़की के पिता के सिर पर जैसे एक और वज्र गिर पड़ा।
पहले पत्नी को खोया था।
आज अपने बेटे को खो दिया।
उनकी आँखों में आँसू कम थे —
शायद क्योंकि आँसू भी अब सूख चुके थे।
घर का आँगन, जहाँ कुछ दिन पहले तक गुजिया बन रही थीं,
अब वहीं मातम पसरा था।
और उस लड़की के भीतर…
एक ऐसा तूफ़ान उठ चुका था
जिसे कोई देख नहीं पा रहा था।
खून की वह होली बीत चुकी थी।
अंतिम संस्कार हो चुका था।
रिश्तेदार लौट गए।
गाँव फिर से अपनी सामान्य चुप्पी में डूब गया।
पर उस घर में कुछ भी सामान्य नहीं था।
एक शाम, जब आँगन में सन्नाटा था,
पिता ने दोनों बच्चों को अपने पास बिठाया।
उनकी आवाज़ भारी थी —
पर निर्णय स्पष्ट।
“हम यह गाँव छोड़ देंगे।”
यह शब्द सुनते ही जैसे हवा भी ठहर गई।
वह जानते थे —
यहाँ न्याय नहीं मिलेगा।
यहाँ सुरक्षा नहीं है।
और वे अपने बचे हुए बच्चों को खोने का जोखिम नहीं उठा सकते।
जमीन…
खेत…
खलिहान…
पूर्वजों की मिट्टी…
सब कुछ पीछे छूटने वाला था।
पर पिता के लिए सबसे कीमती उनकी संतान थी —
न कि संपत्ति।
कुछ ही दिनों में उन्होंने सब समेट लिया।
कुछ ज़मीन औने-पौने दामों में दे दी।
कुछ यूँ ही छोड़ दी।
और एक सुबह —
वे उस गाँव को हमेशा के लिए अलविदा कहकर चले गए।
नए शहर में जीवन शुरू तो हुआ,
पर स्मृतियाँ पीछे नहीं छूटीं।
हर साल जब होली आती —
लोग रंगों की बातें करते,
मिठाइयों की खुशबू फैलती,
ढोलक बजती —
तो उसकी आँखों के सामने वही खेत आ जाता।
वही चिल्लाहट।
वही धमकी।
वही खामोशी।
होली उसके लिए त्योहार नहीं रही।
वह एक तारीख़ बन गई —
जिसने उसका बचपन छीन लिया।
साल बीत चुके हैं।
गाँव पीछे छूट चुका है।
जीवन ने नया रूप ले लिया है।
पर कुछ स्मृतियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं।
हर वर्ष जब फाल्गुन की हवा चलती है,
जब गलियों में रंग घुलते हैं,
जब बच्चे “होली है!” चिल्लाते दौड़ते हैं —
वह खिड़की के पास आकर बैठ जाती है।
उसकी आँखें बाहर नहीं देखतीं —
वे भीतर देखती हैं।
उसे फिर वही खेत दिखाई देता है।
वही सांझ।
वही डर।
वही धमकी।
और फिर…
उसका छोटा भाई — कैलाश।
मासूम मुस्कान वाला चेहरा।
हाथों में अबीर लिए दौड़ता हुआ।
और अगली ही स्मृति में —
सब कुछ शून्य।
उसकी पलकों के कोनों में नमी भर आती है।
वह आँसू पोंछती नहीं।
बस बह जाने देती है।
घर में उस दिन कोई रंग नहीं घुलता।
न पिचकारी निकलती है।
न गुजिया बनती है।
होली उनके घर में त्योहार नहीं —
एक तारीख़ है।
एक घाव है।
एक अधूरी आवाज़ है।
वह जानती है —
कुछ रंग कभी वापस नहीं आते।
और इसलिए…
वह होली नहीं मनाती।
शायद कभी नहीं मनाएगी।


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