शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

परिवर्तन

कल का मानव कहाँ था रहता,
कितने प्रकार के कष्ट सहता।

फिर भी अपना पालन-पोषण करता,
तन पर कपड़े बिना वो रहता।

जंतु पेड़ों की खाल पहनता,
जी-तोड़ परिश्रम करता।

नये औज़ार औज़ार बनाता,
नयी तरकीबे लड़ाता।

कंद-मूल फल तोड़कर लाता,
खुद खाता, सबको खिलाता।

विज्ञान का वह नहीं जानता,
खुद ही वो अनुमान लगाता।

तरह-तरह के प्रयास करता,
जिसका परिणाम हमें आज है दिखता।

आज प्रखर विज्ञान विधाता,
नये रंगों का संगम लगाता।

ये सुखद चमत्कार है कैसा,
उन आँखों पर विश्वास नहीं होता।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

स्त्री एक शक्ति

स्त्री हूं👧

स्री हूं, पाबंदियों की बली चढ़ी हूं, मर्यादा में बंधी हूं, इसलिए चुप हूं, लाखों राज दिल में दबाए, और छुपाएं बैठी हूं, म...

नई सोच