ऊबना ही जिनका स्वभाव हो,
वो कहीं भी ऊब जाते हैं।
भरी महफ़िल की
चहल-पहल से ऊब जाते हैं,
हसीन वादियों की
खूबसूरती से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।
चलते-चलते अपनी ही
चाल से ऊब जाते हैं,
जीते-जीते जीने के
अंदाज़ से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।
संबंधों में सामंजस्य हो,
उस एकरसता से ऊब जाते हैं।
रिश्तों में खट्टास हो,
उस खिंचाव से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।
घर में रहकर
घर की दीवारों से ऊब जाते हैं,
बाहर रहकर
बाज़ारों से ऊब जाते हैं।
ऊबने वाले लोग,
कहीं भी ऊब जाते हैं।
ऊबने वालो! तब क्या करोगे,
जब हर बात से ऊब जाओगे?
भागोगे कहाँ तक उस ऊब से,
जो बाहर नहीं — तुम्हारे भीतर है।
जहाँ भी जाओगे,
वही ऊब फिर से पाओगे।
तुम्हें बाहर कुछ नहीं बदलना है,
ऊब का हल अपने भीतर खोजना है।
हटाओ वो परतें,
जिनके नीचे ऊब का बिछौना है।
तभी जीवन रंग लाएगा,
तभी मन स्थिर हो पाएगा।
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