जब तुमने
उपस्थिति और अनुपस्थिति
को एक ही परिभाषा में दर्ज़ करा दिया...
तो अब...
फ़र्क ही क्या पड़ता है...
कि तुम...
उपस्थित हो या अनुपस्थित...
होते हुए भी — तुम नहीं हो,
नहीं होते हुए भी — नहीं ही हो...
तो फिर...
फ़र्क ही क्या पड़ता है,
कि तुम कहाँ हो?
तुम जीवन को
प्रयोगशाला बना दो,
अपने प्रयोगों की
प्रदर्शनी लगा दो...
फ़िर... फ़र्क ही क्या पड़ता है,
कि तुम भावनाओं को धुआँ
बना कर उड़ा दो...
आज की दबी हँसी को
कल की खुशी बता दो,
वर्तमान की नींव ढहा कर
भविष्य का भवन बना दो...
फ़िर फ़र्क ही क्या पड़ता है,
तुम शब्दों का.. कैसा भी..
चक्रव्यूह बना दो।
✍️ — मनुप्रियश्री
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें