गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

अंतर्मुखी – एक हँसी की हत्या


अंतर्मुखी

(एक हँसी की हत्या की कहानी)

चौदह साल की उम्र…
लोग कहते हैं—यही उम्र सपनों की होती है।

पर उसके लिए…
यही उम्र उम्रकैद बन गई।

कल तक जो लड़की मोहल्ले की गलियों में धूल उड़ाती भागती थी,
पेड़ों पर चढ़ती थी,
जोर से हँसती थी-
आज अचानक उसे लगा जैसे उसे किसी अदृश्य जेल में धकेल दिया गया हो।

माँ-बाप के शब्द बदल गए थे—

“वहाँ मत जाओ…”
“इससे मत बोलो…”
“लड़कियाँ ऐसे नहीं हंसती…”
“संभलकर चलो…”

वो हैरान थी—
मैं बड़ी क्यों हो रही हूँ?
और बड़ी होना… सज़ा क्यों है?

उसके भीतर एक घुटन पलने लगी।
जिस बच्ची के पंख कल तक हवा चीरते थे,
उसे अब जमीन पर रेंगना सिखाया जा रहा था।

हर हफ़्ते पिता का ‘लेक्चर’…
लंबी-लंबी हिदायतें…
और सबसे बड़ा डर—

“किसी लड़के से बात करते पकड़ी गई तो समझ लो… दुनिया खत्म!”

धीरे-धीरे उसकी हंसी, उसकी चंचलता, उसका उन्मुक्त मन—
सब कुचला जाने लगा।

जैसे उफनती नदी पर बाँध कस दिया जाए,
और भीतर का पानी किसी दिन जलजला बनकर फटने को तैयार हो।

स्कूल खत्म हुआ।
9वीं–10वीं का पढ़ाई का बोझ बढ़ा।
और बचा हुआ समय—
डाँट, डर और निर्देशों में बीतने लगा।

उन्हें पता भी नहीं चला—
उन्होंने एक चंचल बच्ची को
धीरे-धीरे एक ‘अंतर्मुखी’ में बदल दिया।

उनके शब्द उसके दिमाग में पत्थर बन गए—

“ज़रा सी चूक हुई तो समाज तुझे गलत कहेगा।”

उसने अपने भीतर एक दुनिया बसाई—
कविताएँ, कहानियाँ…

पर पिता ने इसे भी ‘बेकार शौक’ कहकर दबा दिया।

फिर भी वो लिखती रही।
क्योंकि जब पूरी दुनिया सवाल बन जाए—
तो कलम ही जवाब बनती है।


---

कॉलेज — खुला आकाश या नया डर?

कॉलेज पहुँची तो दुनिया बड़ी दिखी,
पर उसके लिए नियम और सख्त हो गए।

किसी लड़के से बात करनी हो तो पहले “भैया” बनाना जरूरी था।
धीरे-धीरे पूरी क्लास उसके भाइयों से भर गई।

एक सीनियर था—
जिसकी शक्ल उसके असली भाई से मिलती थी।
वो भी उसका भाई बन गया।
माधव भैया।

वक़्त बीता।
वो पास आउट हो गया।
रिश्ता बस राखी तक सिमट गया।

और फिर…
एक साल बाद वो बाज़ार में मिल गया।

“अरे! माधव भैया… आप?”

उसकी आँखों में सचमुच खुशी थी।

पर पिता की आँखों में—
सवाल।

“कौन-सा सब्जेक्ट?”
“कॉमर्स? और ये साइंस?”

मधुर को लगा—
जैसे किसी ने एक साफ रिश्ते पर दाग लगाने की कोशिश की हो।

माधव चुपचाप हट गए।
और एक सच्ची राखी वाली डोर
वहीं भीड़ में टूट गई।


---

डर… जो घर से शुरू हुआ

एक दिन वो शिक्षक के केबिन में सवाल पूछने गई थी।
पिता अचानक अंदर आ गए।

उसका शरीर जम गया।
इतनी घबराई कि अपने ही पिता को हाथ जोड़कर “नमस्ते” कर दिया।

शिक्षक समझ नहीं पाए—
ये डर आखिर किस बात का है?

घर में जोर से हंसना मना था।
जोर से बोलना मना था।
गाना… तो जैसे अपराध था।

एक दिन पिता बाहर गए।
बच्चों ने राहत की सांस ली।
थोड़ी हंसी… थोड़ी बातचीत…

और मधुर—
कुछ पलों के लिए फिर से वही पुरानी लड़की बन गई।

पर किस्मत…

दरवाज़े पर पिता खड़े थे।

“बेशर्म!
ये लड़की के लक्षण हैं?”

उसकी हंसी उसी पल रुक गई।

आँखें भर आईं—
पर रो भी नहीं सकती थी।

क्योंकि नियम था—
“रोओ… मगर आवाज़ नहीं होनी चाहिए।”

और उस दिन—
उसने सिर्फ हँसना नहीं छोड़ा…

उसने महसूस करना भी कम कर दिया।


---

अंत

लोग कहते हैं—
वो बहुत शांत है।
बहुत समझदार है।
बहुत सधी हुई है।

उन्हें क्या पता—
उसकी खामोशी कोई गुण नहीं…
एक लगातार दी गई सज़ा है।

उसकी आवाज़ किसी दिन मरी नहीं थी—
उसे धीरे-धीरे दबाकर दफन किया गया था।

और उस दफनाई गई आवाज़ का नाम था—

“अंतर्मुखी।”



 


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