🌑 दो चिताओं के बीच एक मां
— मनुप्रियश्री
मां…
यह शब्द जब ज़ुबान पर आता है, तो भीतर कहीं एक कोमल जगह पिघलती है।
लेकिन हर मां की कहानी कोमल नहीं होती।
कुछ मांएँ फूल नहीं, पत्थर बनकर जीती हैं—
ताकि उनके बच्चे काँटों पर न चलें।
वह भी ऐसी ही मां थी।
शादी के शुरुआती सालों में उसने सपने देखे थे।
छोटा-सा घर, शाम की चाय, बच्चों की हँसी।
लेकिन कुछ ही सालों में उसे समझ आ गया—
उसके हिस्से में चाय नहीं, चीखें हैं।
हँसी नहीं, हड़कंप है।
उसका पति शराब पीता था।
सिर्फ पीता नहीं था—
शराब में डूब जाता था।
शाम होते ही उसका चेहरा बदल जाता।
आँखें लाल, आवाज भारी, शब्द गंदे।
पहले-पहल वह समझाती थी—
“इतना मत पीजिए…”
फिर डरने लगी।
फिर चुप हो गई।
जब पहला बेटा पैदा हुआ,
उसने सोचा— अब सब बदल जाएगा।
लेकिन शराब बच्चों की किलकारी नहीं सुनती।
बेटे बड़े होते गए।
उन्होंने अपने पिता को दो रूपों में देखा—
सुबह का शांत आदमी,
और रात का राक्षस।
मां ने हर रात उन्हें अपने पास सुलाया।
कानों पर हाथ रखकर कहानियाँ सुनाईं—
“एक राजा था…”
बाहर गालियाँ गूँजती रहीं,
अंदर परियाँ उड़ती रहीं।
वह चाहती थी कि उनके बचपन में
शराब की गंध दर्ज न हो।
लेकिन गंध दीवारों से भी नहीं जाती।
बड़ा बेटा चुप स्वभाव का था।
बहुत कम बोलता।
वह पिता को देखता रहता—
घूरता नहीं, पर समझता भी नहीं।
छोटा बेटा मां से ज्यादा जुड़ा था।
वह हर लड़ाई के बाद मां के आँसू पोंछता।
कहता—
“मां, मैं बड़ा होकर आपको यहाँ से ले जाऊँगा।”
मां मुस्कुराती।
जानती थी—
हर बच्चा अपनी मां से यही वादा करता है।
समय बीता।
बड़े बेटे की नौकरी लगी।
मां ने राहत की साँस ली—
“अब यह घर बदल जाएगा।”
उसने उसकी शादी कर दी।
बहू आई—
नई उम्मीद की तरह।
लेकिन कुछ महीनों में ही बहू की आँखों में वही डर था
जो कभी उसकी आँखों में हुआ करता था।
एक दिन बहू ने धीरे से कहा—
“वह भी पीते हैं…”
मां के कानों में जैसे किसी ने सीसा भर दिया।
इतिहास उसके सामने खड़ा था—
जीवित।
वह समझाना चाहती थी।
डाँटना चाहती थी।
रोना चाहती थी।
लेकिन वह सिर्फ बैठी रह गई।
बहू चली गई।
फिर आई।
फिर गई।
फिर हमेशा के लिए चली गई।
अब बड़े बेटे के पास कोई रोक नहीं थी।
वह देर तक पीता।
फिर दिन में भी।
फिर सुबह भी।
उसकी नौकरी चली गई।
कमरे का दरवाज़ा बंद रहने लगा।
अंदर बोतलें बढ़ती रहीं।
बाहर मां की बेचैनी।
एक रात उसने दरवाज़ा खटखटाया।
कोई जवाब नहीं।
सोचा— सो रहा होगा।
सुबह खबर आई—
वह अब कभी नहीं जागेगा।
लोग आए।
भीड़ लगी।
शोर हुआ।
लेकिन मां के कानों में कुछ नहीं पड़ा।
उसे सिर्फ इतना दिखा—
उसका बच्चा,
जो कभी उसकी उंगली पकड़कर चला था,
अब सफेद चादर में लिपटा पड़ा है।
चिता जली।
धुआँ उठा।
मां ने धुएँ में अपना आधा अस्तित्व जाते देखा।
पति रोया।
बहुत रोया।
कहा—
“मेरी वजह से…”
लेकिन शाम होते-होते
उसके हाथ फिर बोतल ढूँढ़ रहे थे।
उस दिन मां के भीतर कुछ टूट गया।
आवाज़ नहीं हुई—
बस एक स्थायी दरार पड़ गई।
छोटा बेटा दूर रहने लगा।
वह समझदार था।
वह बच गया।
घर में अब सिर्फ दो लोग थे—
एक शराबी,
और एक स्त्री
जो रोज़ अपने अतीत के बीच बैठी रहती।
साल बीत गए।
बाल सफेद हो गए।
चेहरा झुर्रियों से भर गया।
लेकिन शराब की आदत जवान रही।
एक सुबह अजीब शांति थी।
न गाली।
न बोतल की आवाज़।
वह कमरे में गई।
वह वैसे ही पड़ा था।
सिर लटका हुआ।
मगर इस बार सचमुच स्थिर।
चेहरा नीला।
होंठ पर सूखा झाग।
उसने नब्ज़ टटोली।
कुछ नहीं।
वह कुर्सी पर बैठ गई।
उसे लगा—
जैसे कोई लंबा शोर अचानक बंद हो गया हो।
आज उसके भीतर आँसू नहीं थे।
क्योंकि वह सालों पहले रो चुकी थी।
आज उसे दुःख नहीं था।
क्योंकि दुःख की सीमा पार हो चुकी थी।
आज उसे डर नहीं था।
क्योंकि खोने को कुछ बचा ही नहीं था।
उसने बस एक गहरी साँस ली।
और पहली बार
उसे लगा—
घर सचमुच शांत है।
लेकिन उस शांति की कीमत
दो चिताएँ थीं।
और एक मां—
जो अब सिर्फ मां नहीं,
समय की गवाही बन चुकी थी।
— मनुप्रियश्री
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