वो ऐसा ही था…
कुछ लोग होते हैं जिनकी दुनिया वही होती है जो उनकी आँखों के सामने चल रही होती है—
ना अतीत की चिंता, ना भविष्य की फिक्र।
वो भी बिल्कुल ऐसा ही था।
उसकी ज़िंदगी में सबसे पहले वो खुद था, फिर उसके वही आवारा दोस्त—लड़के भी, लड़कियाँ भी—और फिर उस तफ़री भरी, बेमक़सद ज़िंदगी का एक अनवरत सिलसिला।
कहीं भी खा लेना, कहीं भी लेट जाना, रात किसकी और सुबह किसकी, इसका कोई हिसाब नहीं।
माँ–बाप ने भी शायद किशोरावस्था से ही उसे इतना खुला छोड़ दिया था कि अब उसके जीवन में न नियम थे, न दिशा।
बस एक मामूली-सी नौकरी थी एक निजी कंपनी में।
सैलरी ठीक-ठाक थी, इतनी कि एक इंसान चैन से जी ले—चाहे तो थोड़ा बचत भी कर ले…
लेकिन बचत के लिए ज़रूरी थी लगाम, और जनाब तो बे-लगाम हवा की तरह घूम रहे थे।
सप्ताहांत का मतलब पब, डिस्को, शराब, घूमना—
ये ही था उसका फ़लसफ़ा।
ज़िंदगी बीत नहीं रही थी, फिसल रही थी।
मगर एक दिन यह एहसास उसके सीने में चुभा—
कि ज़िंदगी के साथ उसकी उम्र भी फिसल रही है।
दोस्त शादीशुदा होने लगे थे, कई घर–गृहस्थी में व्यस्त,
और कुछ जो तफ़रीबाज़ बचे भी थे, वो भी हमेशा उपलब्ध नहीं रहते थे।
धीरे-धीरे वो अपनी रौशनी–भरी रातों में भी एक अजीब-सी खालीपन महसूस करने लगा।
इसी खालीपन ने उसके मन में एक लालसा जगा दी—
"मेरी भी पत्नी होगी…
ऑफिस से लौटूँगा तो गरम-गरम चाय लेकर इंतज़ार कर रही होगी…
वीकेंड पर साथ घूमेंगे…
कमरा सुनसान नहीं लगेगा…
ज़िंदगी थोड़ी प्यारी हो जाएगी…"
वो सिर्फ फ़ायदे देख रहा था,
नुक़्सान की तरफ झाँकने की फुर्सत कहाँ थी।
कभी भी कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले—
समाज को एक तरफ कर दो।
लोग क्या कहेंगे, इस पर जीने से अच्छा है जीना ही छोड़ दो।
क्योंकि शादी एक एग्रीमेंट नहीं, जीवन का लम्बा सफ़र है।
मगर जनाब को तो बस चाय के कप और मुस्कानें ही दिख रही थीं।
उधर उनकी जिंदगी का सच ये था कि—
सैलरी 15 दिन में उड़ जाती,
हर बार बॉस से एडवांस लेना पड़ता,
सेविंग नाम की कोई चीज़ नहीं,
ऊपर से दो-तीन क्रेडिट कार्ड…
और सब पर पूरा तामझाम—
दोस्तों की पार्टियाँ, किसी को गैजेट चाहिए तो कार्ड स्वाइप कर दो।
लोग उन्हें अमीर समझते थे—
और वो इसी भ्रम में खुश थे।
मगर भ्रम कभी पेट नहीं भरता, सिर्फ जेब खाली करता है।
धीरे-धीरे दोस्त भी छंट गए।
पार्टियाँ ख़त्म, तफ़री ख़त्म,
और वो अकेला—
खुशियों की राख में हाथ सेंकता हुआ।
ज़िंदगी बिन उद्देश्य की होती जा रही थी,
और ऐसे ही एक बेमक़सद मोड़ पर उसने एक फ़ैसला लिया—
शादी।
कई जगह कोशिश की, कई बार रिजेक्ट हुआ, कई बार बात बनते-बनते बिगड़ गई।
एक साल निकल गया।
वो थक चुका था।
पर भीतर कहीं एक आस अभी भी धड़क रही थी।
सबसे सस्ता तरीका था —
SimplyMerry
(जहाँ अकाउंट बनाने में पैसे नहीं लगते)।
वहीं एक लड़की का प्रोफाइल दिखा।
उसे पसंद आ गई।
मैसेज भेज दिया।
एक घंटे बाद रिप्लाई आया—
और जनाब के दिल में उम्मीद की एक छोटी-सी घंटी बजी।
अबकी बार उन्होंने अपना पूरा “चिकना बटर” लगा दिया—
एक-एक शब्द में मिठास,
एक-एक वाक्य में अपनापन।
कुछ लड़कियाँ सच में भोली होती हैं…
चिकनी-चुपड़ी बातों पर पैर रखते-रखते फिसल ही जाती हैं।
वो लड़की भी फिसल गई।
लड़का उसे ऐसा लगा जैसे कलयुग में देवता मिल गया हो।
इतनी विनम्रता? इतनी मिठास?
उसने जीवन में कभी नहीं देखी थी।
और वह खुद बचपन से “तातायों के झुंड”—रूखे, कठोर पुरुषों—के बीच पली थी।
तो जनाब की मिठास उसे सीधा दिल तक उतर गई।
मां–बाप ने मना किया, बहुत समझाया—
"घर, कमाई, माहौल, स्थिरता देख ले बेटी।"
पर जब अक्ल पर पर्दा पड़ जाए,
तो फिर भगवान भी हाथ खड़े कर देते हैं।
लड़की अड़ गई—
"यही सही है। व्यवहार अच्छा है, बाकी सब हो जाएगा।"
हक़ीक़त यह थी कि माँ-बाप ने अंत में कह दिया—
“जा, तेरी ज़िंदगी तू संभाल।”
लड़का अपने पिता के साथ लड़की देखने आया।
लड़के के पिता अनुभवी थे—
उन्होंने तुरंत समझ लिया कि लड़की और उसका परिवार रिश्ता करने को तैयार है।
ऐसा मौका निकलना नहीं चाहिए था।
और बात पक्की हो गई।
एक महीने में शादी की तारीख तय हो गई।
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