यूं ही निकाल देते है,
हम अपनी ज़िन्दगी,
कुछ गैरजरूरी कामों में,
और कुछ गैरजरूरी बातों में,
मगर भूल जाते हैं,
लम्हा लम्हा खिसक रही है
ज़िन्दगी।
लम्हा लम्हा उम्र की
परतें बढ़ रहीं हैं
विचारों में नहीं
कामों में नहीं
मगर चेहरे पर
धीरे धीरे झलकने
लगी है परिपक्वता
सामंजस्य बैठाना है
हमें चेहरे-विचारों
और कर्मो की परिपक्वता
के बीच।
हमें परिपक्व होना
है उतना ही
जितने हम अपनी उम्र से
परिपक्व हो रहे हैं।
क्योंकि पशु नहीं हैं हम
मनुष्य हैं।
हमारे उत्तरदायित्व
कुछ और भी हैं।
तो फिर क्यों हम,
सिर्फ पेट भरने को जिएं?
इस ब्लॉग में आप पाएंगे मेरी लिखी हुई कविताएं, कहानियाँ और शायरियाँ, जो भावनाओं, जीवन के अनुभव और दिल की बातें बयां करती हैं। हर पोस्ट में आपको सुकून और आत्मा को छूने वाला अनुभव मिलेगा। On this blog, you will find my original poems, stories, and shayari reflecting emotions, life experiences, and heartfelt thoughts. Each post offers a touch of serenity and soulful expression for every reader.
बुधवार, 18 सितंबर 2019
लम्हा लम्हा🌎
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